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रविवार, जून 12, 2022

पौशानाटिका के जलवे

कुछ दिन पहले उत्तरपूर्वी इटली में हमारे शहर स्किओ (Schio) में रंगबिरंगी पौशाकें पहने हुए बहुत से नवयुवक और नवयुवतियाँ वार्षिक कोज़प्ले (Cosplay) प्रतियोगिता के लिए जमा हुए थे। "कोज़प्ले" क्या होता है, यह मुझे कुछ साल पहले ही पता चला था। कोज़प्ले शब्द दो अंग्रेज़ी शब्दों को मिला कर बना है, कोज़ यानि कोस्ट्यूम (Costume) या रंगमंच की पौशाक और प्ले (Play) यानि खेल या नाटक। इस तरह से मैंने कोज़प्ले शब्द का हिंदी अनुवाद किया है पौशानाटिका।



कोज़प्ले यानि पौशानाटिका


कोज़प्ले की शुरुआत जापान में पिछली शताब्दी के सत्तर के दशक में हुई, जब कुछ किशोर रोलप्ले वाले खेलों और माँगा कोमिक किताबों के पात्रों की पौशाकें पहन कर मिलते थे। 1990 के दशक में कमप्यूटर खेलों का प्रचलन हुआ जब गेमबॉय जैसे उपकरण बाज़ार में आये तो कोज़प्ले और लोकप्रिय हुआ। तब से आज तक इस कोज़प्ले या पौशानाटिका का दुनिया में बड़ा विस्तार हुआ है। नये कमप्यूटर खेल, विरच्युल रिएल्टी, एनिमेटिड फ़िल्में आदि के पात्र भी इस परम्परा का हिस्सा बन गये हैं।

हमारे शहर में जो पौशानाटिकी समारोह होते हैं, उनमें सबसे अधिक लोकप्रिय हैं - डनजेन एण्ड ड्रेगनज जैसे रोलप्ले वाले खेल, जापान की माँगा (Manga) कोमिक्स किताबें और आनिमे (Anime) एनेमेशन फ़िल्में और टीवी सीरियल। इन सबमें दिलचस्पी रखने वाले लोग, अपने किसी एक प्रिय पात्र को चुन कर उनके जैसी पौशाकें बनाते हें, उनकी तरह बालों का स्टाईल बनाते हैं, उनके जैसा मेकअप करते हैं। जब यह सब लोग मिल कर कहीं इक्ट्ठा हो जाते हैं तो वहाँ कोज़प्ले के मेले लग जाते हैं।


जापान से धीरे धीरे कोज़प्ले का फैशन सारी दुनिया में फ़ैला है। यूरोप के हर देश में जगह जगह पर वार्षिक कोज़प्ले मेले लगते हैं, जहाँ लाखों लोग एकत्रित होते हैं, उनकी प्रतियोगिता होती हैं कि किसकी पौशाक सबसे सुंदर है, किसका अभिनय अपने पात्र से अधिक मेल खाता है, आदि।

अमरीका में सन दियेगो और लोस एन्जेल्स शहरों के कोज़प्ले बहुत मशहूर हैं। जापान के नागोरो में आयोजित होने वाला कोज़प्ले अपनी तरह का दुनिया का सबसे बड़ा मेला है। इटली में कई शहर ऐसे आयोजन करते हैं, जिसमें सबसे प्रसिद्ध है लुक्का (Lucca) शहर में होने वाला मेला। हमारे शहर का पौशानाटिकी मेला उन सबके मुकाबले में छोटा सा है, इसमें कोई सौ या दो सौ नवजवान हिस्सा लेते हैं जबकि बड़े समारोहों में लाखों लोग सजधज कर एकत्रित हो जाते हैं।


हमारे शहर का पौशानाटकी मेला नया है, केवल कुछ साल पुराना, लेकिन मैं इसमें शामिल होने वालों की पौशाकें और मेकअप देख कर दंग रह गया। पौशानाटिका के अभिनेता जिस पात्र को चुनते हैं उसके हावभाव, बोलने और चलने का तरीका, सब कुछ उन्हें वैसे ही करना होता है। मुझे इन कमप्यूटर खेलों, माँगा, आनिमे कामिक्स और फ़िल्मों की थोड़ी सी भी जानकारी नहीं है इसलिए यह तो नहीं कह सकता कि वह लोग अपने पात्रों की नकल करने में कितने सफल थे, लेकिन उन्हें देख कर मुझे लगा कि हमारे बचपन में इस तरह के मेले होते तो मुझे भी ज़ोम्बी या राक्षस बनना अच्छा लगता।

कोज़प्ले में हिस्सा लेने वालों का एक नियम है कि बिना उन्हें बताये उनकी फोटो नहीं खींचे। फोटो खींचनी हो तो आप को उन्हें बताना चाहिये ताकि वह अपने पात्र की अपनी मुद्रा में पोज़ बना कर फोटो खिंचवायें। हमारे कोज़प्ले में मैंने जितने लोगों से फोटो खींचने की अनुमति माँगी, उनमें से केवल एक युवती ने मना किया।

क्या भारत में कोई कोज़प्ले मेले लगते हैं? अगर आप को उनके बारे में मालूम है तो नीचे टिप्पणीं में यह जानकारी दीजिये।

कोज़प्ले जैसे अन्य मेले


उत्तरपूर्वी इटली में स्थित हमारे जिले का नाम है वेनेतो (Veneto) और इसका मुख्य स्थान है वेनेत्जिया (Venezia) यानि वेनिस (Venice) का शहर, इसलिए हमारे पूरे जिले में वेनिस की सभ्यता का गहरा प्रभाव है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में इटली एक देश बना, उससे पहले वेनिस एक स्वतंत्र देश माना जाता था, जहाँ के नाविक और जहाज़ दुनिया भर में घूमते थे। वेनिस के मार्कोपोलो की कहानी तो जगप्रसिद्ध है।

वेनिस में फरवरी-मार्च के महीनों में कार्निवाल का त्योहार मनाते हैं जिसे आप पुराने ज़माने का पौशानाटिका मेला कह सकते हैं। आजकल कार्निवाल को ईसाई त्योहार मानते हैं लेकिन लोगों का कहना है कि यह त्योहार बहुत पुराना है, ईसाई धर्म से भी पुराना।


हर वर्ष कार्निवाल के लिए करीब एक महीने तक भिन्न उत्सवों को आयोजित किया जाता है जिनमें लोग विषेश पौशाकें और मुखौटे बनवा कर पहनते हैं। पौशानाटिकी की तरह लोग इसके लिए बहुत पैसा खर्च करते हैं और कई कई महीनों तक इसकी तैयारी करते हैं। कोज़प्ले और कार्निवाल में एक अंतर है कि कोज़प्ले किशोरों और नवजवानों का शौक है, जबकि कार्निवाल में नवजवान, प्रौढ़ और वृद्ध सभी लोग अपनी पौशाकों में हिस्सा लेते हैं।


वेनिस का कार्निवाल दुनिया भर में प्रसिद्ध है, लोग दूर दूर से इसे देखने आते हैं।

हमारे शहर में एक अन्य तरह का पौशानाटकी मेला भी होता है जिसका नाम है स्टीमपँक (Steampunk)। स्टीम यानि भाप और पँक यानि रंगबिरंगे और अजीबोगरीब कपड़ों और बालों का स्टाईल जिसे कुछ रॉकस्टार गायकों से प्रसिद्धी मिली थी। कोज़प्ले की तरह इसकी शुरुआत भी पिछली शताब्दी के सत्तर के दशक के आसपास हुई थी।


इस परम्परा को शुरु करने वाले लोग फ्राँसिसी लेखक जूल्स वर्न की किताबों से प्रभावित थे। यह लोग प्राद्योगिक युग के प्रारम्भ में भाप से चलने वाली स्टीम इंजन जैसी मशीनों को महत्व देते हैं और इनकी पौशाकों में एक ओर से कीलों, ट्यूबों, नलियों, घड़ी के भीतर के हिस्सों आदि का प्रयोग किया जाता है, दूसरी ओर से यह लोग विक्टोरियन समय के वस्त्रों को प्राथमिकता देते हैं। कार्निवाल तथा कोज़प्ले की तरह, यह लोग भी अपने पौशाकों, मेकअप आदि पर बहुत पैसा और समय लगाते हैं। बहुत से लोग हर वर्ष नयी पौशाकें बनवाते हैं।

मुझे स्टीमपँक की पौशाकें बहुत अच्छी लगती हैं। कई बार देखा कि यह लोग आधुनिक उपकरण जैसे कि मोबाईल फोन, कमप्यूटर और कैमरे आदि को ले कर, उन्हें विभिन्न धातुओं या पदार्थों से ढक कर पुराने ज़माने की वस्तुओं का रूप देते हैं, जैसे कि आप नीचे वाली तस्वीर के सज्जन के कैमरे में देख सकते हैं। उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने अपने नये कैमरे को पुराने बक्से में बँद करके, उन्होंने उस पर भिन्न बटन लगाये, डॉयल फिट किये और धातूओं का लेप लगाया, जिससे कैमरा देखने में किसी म्यूज़ियम से निकला लगता था लेकिन तस्वीरें अच्छी खींचता था।

इसमें हिस्सा लेने वाले अधिकतर लोग प्रौढ़ या वृद्ध होते हें, उनमें नवजवान कम दिखते हैं, शायद इसलिए क्योंकि इस शौक को पूरा करने के लिए काफ़ी पैसा और समय होना चाहिये।


इनके अतिरिक्त, इटली के विभिन्न भागों में एतिहासिक घटनाओं और त्योहारों पर भी पुराने समय की पौशाकें पहनने का प्रचलन है, जैसे कि कुछ लोग अपनी नृत्य मँडली बनाते हैं जिसमें वह लोग मध्ययुगीन पौशाकें पहन कर मध्ययुगीन यूरोपी नृत्य सीखते हैं और करते हैं। आधुनिकता की दौड़ में पुराने रीति रिवाज़ लुप्त हो रहें हैं, तो वह लोग चाहते हैं कि अपने पुराने नृत्यों और पौशाकों को जीवित रखें।

अंत में


गोवा में कार्निवाल मनाया जाता है। मैंने एक बार वहाँ कार्निवाल देखा था लेकिन उसमें वैसा कुछ नहीं था, जिस तरह की पौशाकें और मुखौटे इटली में दिखते हैं। ब्राजील में भी गोवा जैसा कार्निवाल मनाते हैं, हालाँकि उनके नृत्य व पौशाकें कुछ बेहतर होती हैं। गोवा तथा ब्राज़ील के लोग पुर्तगाली सभ्यता से अधिक प्रभावित हैं।

मुझे मालूम नहीं कि भारत में किसी अन्य जगह पर कोज़प्ले या स्टीमपँक जैसे मेले लगते हैं या नहीं। लेकिन भारत में भी कुछ लोग धार्मिक मौकों पर देवी देवता का रूप धारण करते हें, जो कि धार्मिक कारणों से करते हैं या फ़िर श्रधालुओं से पैसा माँगने के लिए। भारत में ऐसे कोई त्योहार या मेले हों जहाँ आम लोग भिन्न पौशाकें पहन कर एकत्रित होते हों, मुझे उसके बारे में जानकारी नहीं। अगर आप को हो तो नीचे टिप्पणी में उसके बारे में बताईये।


मेरे विचार में जापानी और पश्चिमी देशों में अकेलापन अधिक बढ़ा है, यहाँ कम लोग विवाह करते हैं और उनमें से केवल कुछ लोग बच्चे पैदा करते हैं। नौकरी करके कमाने वाले और अकेले रहने वाले लोगों के पास पैसे और समय की कमी नहीं, उन्हें जीवन में कुछ अलग सा चाहिये जिससे उनकी मानवीय रिश्तों की कमी घटे। उन्हें इस तरह के मेलों और त्योहारों में अन्य लोगों से मिलने और आनन्द लेने के मौके मिलते हैं, इसीलिए यहाँ यह सब पौशानाटिकी समारोह लोकप्रिय हो रहे हैं।

शनिवार, फ़रवरी 22, 2014

हमारे शरीर, सामाजिक विद्रोह व कलात्मक अभिव्यक्ति

सदियों से पैसे वाले व ताकतवर लोग अपनी तस्वीरें बनवाते आये हैं. पिछली सदी में फोटोग्राफ़ी के विस्तार से हर कोई अपनी तस्वीरें खिचवाने लगा. पिछले दशक में डिजिटल कैमरों के प्रचार से और फेसबुक, टिविटर जैसी वेबसाइट के वजह से तस्वीर खीचना और उस पर बातें करना इतना फैला है कि कुछ लोग मानते हैं कि यह सदी शब्दों की नहीं तस्वीरों की सदी कहलायेगी और इससे मानव सभ्यता में बड़ा बदलाव आयेगा. इन सब की वजह से लोगों का अपनी असहमती दिखाना, विद्रोह प्रदर्शित करना या अपनी बात को कलात्मक तरीकों से अभिव्यक्त करना, इस सब में भी नये प्रयोग हो रहे हैं.

शायद फेमेन (Femen) की विद्रोही युवतियों के बारे में आप ने सुना होगा जो कि अपने वस्त्रहीन शरीर के माध्यम से अपनी बात कहती हैं?

फेमेन का नारा है "मेरा शरीर, मेरा घोषणापत्र". फेमेन में हिस्सा लेने वाली युवतियाँ कहती हैं कि वे लोग नारी का यौनिक शोषण, तानाशाही व धर्म के माध्यम से नारी शरीर पर अधिपत्य कायम करने के विरुद्ध हैं. अक्सर फेमेन की युवतियों पर विभिन्न देशों की सरकार व पुलिस बहुत सख्ती से पेश आती हैं, शायद क्योंकि उनके इस वस्त्रहीन विद्रोह में पृतसत्ता पर आधारित समाज की नींव हिलाने वाली बात है जोकि नारी शरीर को नैतिकता से ढकने पर टिका है.

नारी का शरीर ढकना, लज्जा करना, कौमार्य बचाना आदि को विभिन्न समाजों ने इतना महत्वपूर्ण माना है कि उसे धार्मिक ग्रंथों की सहायता से भगवान के दिये आदेशों की मान्यता दी है. बचपन से ही कन्याओं को यह सिखाया जाता है कि यही नारी का जन्मजात स्वभाव है, और पुरुषों को सीख दी जाती है कि माँ, पत्नी व बहनों के इस लक्ष्मणरेखा में बाँध कर रखने में उनकी व उनके पूर्वजों की इज्जत व आत्मसम्मान निहित हैं.

फेमेन का जन्म यूक्रेन में 2008 में हुआ और जल्दी ही पूर्वी व पश्चिमी यूरोप से होता हुआ उत्तरी अफ्रीका व मध्यपूर्व के देशों तक फ़ैल गया. कुछ समय पहले, मिस्र की आलिया अलमाहदी ने जब फेसबुक के माध्यम से अपनी वस्त्रहीन तस्वीर लगा कर अपने परिवार व समाज के प्रति अपना विद्रोह अभिव्यक्त किया तो कुछ लोगों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी और उन्हें मिस्र छोड़ कर स्वीडन में शरण लेनी पड़ी. लेकिन आलिया ने देशनिकाला ले कर भी अपना विद्रोह नहीं छोड़ा, स्वीडन में मिस्री दूतावास के सामने उन्होंने वस्त्रहीन हो कर, हाथ में कुरान को ले कर अपना विद्रोह जताया (आलिया का वीडियो). इससे उनकी जान लेने वाले और बढ़ गये हैं और उन्हें कुछ कुछ दिनो में घर बदल कर, भेष बदल कर रहना पड़ रहा है.

दूसरी ओर शारीरिक नग्नता को कला के माध्यम से सामाजिक संदेश पहुँचाने का माध्यम भी बनाया गया है. अमरीकी फोटोग्राफर स्पैन्सर ट्यूनिक अपनी अमूर्त कला तस्वीरों के लिए बड़ी संख्या में लोगों की वस्त्रहीन तस्वीर खींचने के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं, उनके बारे में मैंने कई वर्ष पहले लिखा था.

मैं अपने शरीर के माध्यम से दुनिया को संदेश देने वाले लोगों के साहस की दाद देता हूँ. इसलिए जब मेरे ब्राज़ीली मित्र मारसेलो ने मुझसे पूछा कि क्या मैं उसके "शरीर के माध्यम से संदेश देने" के फोटोप्रोजेक्ट में हिस्सा लेना चाहुँगा तो मैंने तुरंत हाँ कर दी. मारसेलो के इस फोटोप्रोजेक्ट का नाम है "आ फ्लोर दा पेले" यानि "त्वचा के फ़ूल".

मारसेलो ने एडस् रोग से पीड़ित बच्चों के साथ काम किया है और वह इस फोटोप्रोजेक्ट से सामाजिक व पर्यावरण सरंक्षण का संदेश देना चाहते हैं. उनकी तस्वीरों में शरीर का कमर से ऊपर का हिस्सा वस्त्रहीन होता है जिसपर रंगों से चित्र बनाये जाते हैं. अप्रैल के महीने में मारसेलो इटली आयेगा तो इसके लिए मेरी भी तस्वीर खिंचेगी. आधे धड़ की तस्वीर खिंचवाने में कोई साहस नहीं चाहिये, इसलिए मैं चितित भी नहीं हूँ!

मैं सोच रहा हूँ कि मारसेलो की तस्वीर के लिए शरीर पर कौन सा डिजाइन बनवाना चाहिये? कुछ ऐसा होना चाहिये जिसमें भारत भी हो और प्रकृति व पर्यावरण की बात भी हो. अगर आप के पास कोई सुझाव हों तो अवश्य बताईयेगा.

जब मारसेलो मेंरी तस्वीर खीचेगा तो उसके बारे में आपको बताऊँगा. लेकिन मैं पहले भी कुछ फोटोप्रोजेक्ट में हिस्सा ले चुका हूँ जिनकी कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं:

(1) पहली तस्वीर मेरा कार्टून है जो मारसेलो ने सन 1997-98 के आसपास एक ब्राज़ील यात्रा के दौरान बनाया था.

Sunil Deepak by Marcelo Mendonça

(2) दूसरी तस्वीर वह है जो कुष्ठ रोग दिवस के अवसर पर एक इतालवी पोस्टर के लिए 2003 में खींची गयी थी. इस पोस्टर से कुछ दिनों के लिए मुझे कुछ प्रसिद्ध मिली थी, क्योंकि यह तस्वीर बहुत सी पत्रिकाओं में छपी थी. जहाँ जाता कुछ लोग पहचान जाते , उँगली उठा कर मेरी ओर इशारा करते.

Sunil Deepak for world leprosy day campaign 2003

(3) तीसरी तस्वीर है सन् 2011 से जब मैंने इतालवी कलाकार विर्जिनया फरीना के मृत्यू के बारे में विभिन्न संस्कृतियों में क्या विचार हैं जो कि इस विषय पर आधारित फोटोप्रोजेक्ट के लिए खिचवायी थी. इस तस्वीर को खींचने के लिए उन्होंने अँधेरे कमरे में एक टोर्च व एक गोल नली का उपयोग किया था जिससे वह मृत्यू का आभास देना चाहती थीं.

Sunil Deepak by Virginia farina

इस प्रोजेक्ट की प्रदर्शनी बोलोनिया शहर के कब्रिस्तान में सात सौ वर्ष पुरानी कब्रों के कक्ष में लगी थी. मुझे कई लोगो ने कहा था कि इसमें हिस्सा न लो, जीते जी मरने की तस्वीर खिंचवाना ठीक नहीं होगा. पर मुझे इस फोटोप्रोजेक्ट में हिस्सा लेना बहुत अच्छा लगा था.

Exhibition of Virginia farina at Certosa cemetery of Bologna

(4) चौथी तस्वीर है पिछले वर्ष से जब लाउरा फ्रास्का व लाउरा बासेगा नाम की दो युवतियों ने इटली में रहने वाले विभिन्न देशों के प्रवासियों के बारे में फोटोप्रदर्शनी बनायी थी. इसमें मुझे एक किताब की दुकान में बैठ कर किताब पढ़ते हुए दिखाया गया था.

Sunil Deepak by Laura Frasca & Laura Bassega

(5) यह अंतिम तस्वीर है इसी वर्ष यानि 2014 की. विकलाँग व्यक्तियों के मानव अधिकारों के बारे में चित्रकथा की किताब में मैं भी एक पात्र हूँ. इसको बनाने वाले कलाकार का नाम है कनजानो.

Sunil Deepak by Kanjano

मेरे विचार में एक विषय को ले कर तस्वीरें खीचने का प्रोजेक्ट बनाना कला की नयी विधि है जिससे सामाजिक संचेतना लाना कुछ आसान हो जाता है क्योंकि जितने अधिक लोग इसमें हिस्सा लेते हैं, उनमें से हर कोई फेसबुक, टिविटर, ब्लाग, आदि के माध्यम से अपने परिवार, मित्रों आदि में इसका विज्ञापन करता है और अधिक लोगों को इसके बारे में जानकारी मिलती है.

जिस तरह से मारसेलो ने अपना प्रोजेक्ट बनाया है, उसमें सभी तस्वीरें ब्लाग पर लगायी जा रही हैं इसलिए प्रदर्शनी लगाने का खर्चा नहीं है और यह प्रोजेक्ट वह धीरे धीरे कई सालों तक बना सकते हैं.

मुझे आशा है कि आप को इनसे अपना कोई फोटोप्रोजेक्ट बनाने की प्रेरणा मिलेगी! अगर   ऐसा हो तो मुझे इस बारे में अवश्य बताईयेगा.

***

शनिवार, जुलाई 17, 2010

कोमिक्स साहित्य

बचपन में बेताल की कोम्किस पढ़ना मुझे वहुत अच्छा लगता था. तब इंद्रजाल कोमिक्स के नाम से यह पत्रिकाएँ आती थीं. कुछ साल बाद जब अंग्रेज़ी बोलने समझने की क्षमता बढ़ी तो आर्ची, जगहेड, सुपरमैन, स्पाईडरमैन जैसी कोमिक्स कुछ दिन पढ़ीं पर उनमें मेरी कोई विषेश दिलचस्पी नहीं बनी, और धीरे धीरे मेरा कोमिक्स पढ़ना बंद हो गया. तब लगता कि इस तरह की कोमिक्स की किताबें या पत्रिकाएँ केवल बच्चों के पढ़ने के लिए होती हैं.

इटली में आये तो पहले जापानी चित्रकथाओं से परिचय हुआ, जब मेरा बेटा इनका दीवाना था. उस समय जापानी कामिक्स "मैंगा" (Manga) और जापानी कार्टून फिल्मों "एनीम" (Anime) से परिचय हुआ. बहुत साल के बाद अमर चित्र कथा का नाम सुनाई देने लगा, जिसमें पंचतंत्र, रामायण और महाभारत की कहानियाँ प्रस्तुत की जाती थीं. उस समय विदेशों में इनका प्रसार करते समय कहा जाता कि वे भारत से दूर पैदा हुए भारतीय मूल के बच्चों को भारत की संस्कृति के बारे में बताने का यह अच्छा तरीका है, कि चित्रकथाओं के माध्यम से बच्चे धर्म, परम्पराओं के बारे में भी जानेंगे और साथ ही हिंदी का अभ्यास भी हो जायेगा.

तभी यह बात भी मन में आयी कि शायद इन्हें कामिक्स कहना ठीक नहीं था, क्योंकि कामिक्स का अर्थ है "हँसी मज़ाक", जबकि इनमें तो रहस्य, रोमांच से ले कर प्रेम कथा तक विभिन्न तरह की पत्रिकाए मिलती हैं. इसी तरह से कार्टून शब्द का अर्थ शुरु में तो शायद हाथ से बनी आकृतियों से जुड़ा था लेकिन आज यह भी "हँसी मज़ाक" या "व्यंग" से जुड़ा है, जबकि इस तरह की फ़िल्मों में खेल कूद, प्रेम कथा, एक्शन, सभी कुछ होता है. ओस्कर पुरस्कार पाने वाली फ़िल्म "डांस विद बशीर" (Dance with Bashir), जिसमें फिलिस्तीनियों के शरणार्थी कैंम्प में नरसंहार की कहानी है, या फ़िर ईरानी लेखिका मरजान की "पेरसोपोलिस" (Persepolis), उन्हें कार्टून फ़िल्म कहना अज़ीब सा लगता है, और "एनिमेटिड फ़िल्म" (animated film) कहना अधिक ठीक लगता है, "एनिमेटिड" यानि यानि "कत्रिम जान डाले हुए पात्र".

जैसे जैसे इस दुनिया से अधिक जानकारी हुई, तो अपनी इस सोच को बदलना पड़ा पड़ा कि इस तरह की चित्रकथाएँ केवल बच्चों के लिए होती हैं. बल्कि कुछ चित्रकथाएँ तो केवल व्यस्कों के लिए बनायी जाती हैं. जिन्होंने इंटरनेट पर "सविता भाभी" की चित्रकथाएँ देखी हैं वह यह जानते हैं कि इस तरह की सेक्स से जुड़ी चित्रकथाएँ हिंदी में भी उपलब्ध हैं. मुझे नहीं मालूम कि हिंदी में सेक्स की बात न भी की जाये, तो क्या बड़े लोगों के लिए विषेश रूप से कहानियाँ या किताबें बनती हैं? शायद "ग्राफ़िक उपन्यास" के रूप में बनती हैं? यह तो भारत में रहने वाला कोई जागरूक पाठक ही बता सकता है.

हमारे शहर बोलोनिया में हर वर्ष बिलबोलबुल नाम से चित्रकथा लिखने, बनाने वालों की प्रदर्शनी और ट्रेडफेयर लगते हैं जो यूरोप में इस तरह का सबसे बड़ा मेला है. पिछले वर्ष, इस प्रदर्शनी में बहुत से अफ़्रीकी कलाकार और लेखक आये थे. युद्ध में बच्चों को सैनिक बनाने से ले कर औरतों पर होने वाले अत्याचारों की बातें थीं, विषयों की विविधता थी. कला की दृष्टि से, ग्रफ़िक्स की दृष्टि से, विषय और लेखन की दृष्टि से, हर तरह से लगा कि यह सचमुच साहित्य की विधा है, इसे केवल बच्चों की कहानियाँ सोचना ठीक नहीं. (नीचे की तस्वीर में शराब के नशे में हिंसा और बलात्कार की बात करने वाली एक अफ्रीकी चित्रकथा)

Fumetti africani - Bilbulbol Bologna 2007

इटली में सभी पुस्कालयों और किताबों की दुकानों में चित्रकथाओं की किताबों का अलग से हिस्सा होता है. इतालवी भाषा में इन्हें फूमेत्तो कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है, छोटा सा धूँए का बादल और इस शब्द का मूल उन बादल जैसे बुलबुलों में है जिनमें इन किताबों के पात्रों की बातें लिखी होती हैं. फूमेत्तो के कलाकारों और लेखकों को इतालवी साहित्य जगत में बहुत मान मिलता है, शायद इसलिए भी कि इन किताबों की बिक्री बहुत है और इन्हें लिखने बनाने वालों को पैसा अच्छा मिलता है. इन पर फ़िल्में भी बनती हैं. कुछ लोग अपनी किताबों की कहानी भी लिखते हैं और वही उनके साथ के चित्र भी बनाते हैं, लेकिन अधिकतर, लेखक और चित्र बनाने वाले लोग भिन्न होते हैं.

चित्रकथाओं की दुनिया में जापान का स्थान सबसे आगे है, जहाँ पर मैंगा और एनीम के दीवानों की संख्या लाखों में है, और जहाँ लिखी छपी किताबें विभिन्न भाषाओं में अनुवादित होती हैं, हालाँकि मुझे नहीं मालूम कि यह किताबें हिंदी में भी उपलब्ध हैं या नहीं. मैंगा बनाने और लिखने वाली एक सुप्रसिद्ध जापानी लेखिका कलाकार यहीं बोलोनिया में रहती हैं जिनका नाम है केईको इछिगूचि (Keiko Ichiguchi) जिनसे एक बार मिलने का मौखा मिला था.

जापानी चित्रकाथाओं से एक अन्य नया खेल ने जन्म लिया है जिसका नाम है कोसूपूरे (Kosupure) या कोज़प्ले (Cosplay) जिसमें नवयुवक और नवयुवतियाँ प्रसिद्ध चित्रकाथाओं तथा वीदियोंगेम के पात्रों जैसे वस्त्र पहनते हैं, मेकअप करते हैं जैसे कि आप नीचे की तस्वीर में देख सकते हैं. कोज़प्ले के दीवाने प्रतियोगिताओं का आयाजोन करते हैं, अपने मनचाहे पात्रों जैसा बनने के लिए पैसा और समय दोनो ही लगाते हैं.

Cosplay dresses
(यह तस्वीर feer.wsj.com से)

अगर आप को मौका मिले अपने मनपसंद कोमिक हीरो या हीरोईन के भेस बनाने का, तो आप क्या बनना चाहेंगे? अमरीकी कोमिक वाले सुपरमैन या वंडरवूमन? अमर चित्रकथा से राम या कृष्ण? किसी जापानी मैंगा पर आधारित पात्र? मुझे स्वयं जापानी मैंगा की तरह रंगबिरंगे बालों वाला हीरो बनना अच्छा लगेगा, लेकिन शीशे में अपने शरीर का आकार देखूँ तो लगता है कि सूमों की कुश्ती वाला रोल ही मेरे लिए ठीक रहेगा

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