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मंगलवार, मई 31, 2022

धाय-माँओं की यात्राएँ

इतिहास अधिकतर राजाओं और बादशाहों की और उनके खानदानों, प्रेम सम्बंधों और युद्धों की बातें करते हैं। उन इतिहासों में सामान्य जन क्या कहते थे, सोचते थे, उनका क्या हुआ, यह बातें कम ही दिखती हैं। फ़िर भी, पिछली कुछ शताब्दियों में जब बड़ी संख्या में सामान्य लोगों के जीवनों पर कुछ बड़े प्रभाव पड़ते हैं तो इतिहास बाँचने वालों को उनके बारे में कुछ न कुछ लिखना ही पड़ता है।

ऐसा कुछ अश्वेत लोगों के साथ हुआ जब लाखों लोंगों को भिन्न अफ्रीकी देशों से पकड़ कर यूरोपी जहाजों में भर कर गुलाम बना कर दुनियाँ के विभिन्न कोनों में ले जाया गया। ऐसा कुछ भारतीय गिरमिटियों के साथ भी हुआ जिन्हें काम का लालच दे कर बँधक बना कर मारिशियस, त्रिनिदाद और फिजी जैसे देशों में ले जाया गया। लेकिन हमारे आधुनिक इतिहास की कुछ अन्य कहानियाँ भी हैं जो अभी तक अधिकतर छुपी हुई हैं।



ऐसी छुपी हुई कहानियों में है एक कहानी उन भारतीय औरतों की जिन्हें बड़े साहब लोग अपने बच्चों की देखभाल के लिए आया बना कर विदेशों में, विषेशकर ईंग्लैंड में, साथ ले गये। कुछ महीने पहले एक अंग्रेजी की इतिहास के विषय से जुड़ी पत्रिका हिस्टरी टुडे के जनवरी 2022 के अंक में मैंने सुश्री जो स्टेन्ली का एक आलेख देखा जिसका शीर्षक था "इनविजिबल हैंडज" यानि अदृश्य हाथ, जिसमें 1750 से ले कर 1947 में भारत की स्वतंत्रता तक के समय में भारतीय आया बना कर ले जाई गयी औरतों की बात बतायी गयी थी।

उनका कहना है कि "आया" शब्द पुर्गालियों की भाषा से आया जिसमें नानी-दादी को "आइआ" (Aia) कहते हैं। भारत में इस काम को करने वाली औरतों को "धाय" या "धाय माँ" कहते थे। जैसे कि पन्ना धाय के बलिदान की कहानी बहुत प्रसिद्ध है। अंग्रेजी में इसके लिए "बच्चों की गवर्नैस" का प्रयोग भी होता है।

भारत में रहने वाले अंग्रेजों के घरों में हज़ारों औरतें आया या धाय का काम करती थीं। जब वह लोग छुट्टी पर ईंग्लैंड जाते, तो बच्चों की देखभाल के लिए उनकी आया को भी साथ ले जाते। कुछ लोग भारत में काम समाप्त होने पर हमेशा के लिए ईंग्लैंड लौटते हुए भी कई माह लम्बी समुद्री यात्रा में उन्हें तकलीफ न हो, इसलिए इन औरतों को बच्चों की देखभाल और अन्य काम कराने के लिए साथ ले जाते थे। लेकिन एक बार ईंग्लैंड पहुँच कर वह इन्हें घर से निकाल भी सकते थे और घर वापस लौटने का किराया नहीं देते थे।

भारत में अंगरेज़ साहब और मेमसाहिब के पास बड़े आलीशान बँगले होते थे जिनमें नौकरों को रखने में कठिनाई नहीं होती थी, लेकिन ईंग्लैंड में वापस आ कर, उन साहबों को सामान्य घरों में रहना पड़ता था, तो समस्या होती थी कि भारत से लायी गयी आया को कहाँ रखा जाये? उनके लिए ईंग्लैंड में आया-होस्टल में बन गये थे, जहाँ यह औरतें भारत जाने वाले किसी अंग्रेज परिवार के साथ नयी नौकरी की प्रतीक्षा करती थीं।

न्यू योर्क विश्वविद्यालय की प्रोफेसर स्वप्न बैन्नर्जी अन्य शोधकारों के साथ मिल कर सन् 1780 से ले कर 1945 में भारत उपमहाद्वीप से काम करने के लिए दुनिया भर में ले जाये जानी वाली इन प्रवासी महिलाओं पर शोध कर रही हैं जिसके बारे में आया व आमाह के ब्लोग पर आप पढ़ सकते हैं। इसी ब्लाग पर पिछली सदी के प्रारम्भ का एक विज्ञापन है जिसमें लँडन के दक्षिण हेक्नी इलाके में बने "आया होम" के बारे में कहा गया कि अंग्रेज महिलाएँ कुछ पैसा दे कर भारत से लायी आया को यहाँ रखवा कर उनसे छुटकारा पा सकती हैं, साथ यह यहाँ हिंदुस्तानी बोलने की सुविधा भी है। (विज्ञापन नीचे की छवि में)



कुछ औरतों ने अंग्रेज परिवारों की समुद्री यात्रा में बच्चों की देखभाल का काम अच्छे तरीके से आयोजित किया था। 1922 में ईंग्लैंड में अखबार में छपे एक साक्षात्कार में भारत की श्रीमति एन्थनी पारैरा ने बताया वह 54 बार भारत-ईंग्लैंड यात्रा कर चुकी थीं। एक शोध के अनुसार, 1890 से ले कर 1953 तक, हर वर्ष करीब 20-30 औरतें आया बन कर ईंग्लैंड लायी जाती थीं। इनमें से अधिकतर औरतें "नीची" जाति से होती थीं। इसी काम के लिए कुछ चीनी औरतें भी ईंग्लैंड लायी जाती थीं जिन्हें "अमाह" कहते थे, हालाँकि उनकी संख्या भारतीय मूल की "आयाह" के मुकाबले एक चौथाई से भी कम होती थी।

उन औरतों की देखभाल में पले अंग्रेज बच्चों ने उनके बारे में अपनी आत्मकथाओं तथा स्मृतियों में वर्णन किया है कि उनको इन्हीं औरतों से परिवार का प्यार व स्नेह मिला। इन कहानियों से उन औरतों के जीवन की रूमानी छवि बनती है, जब कि जो स्टेन्ली के अनुसार उनकी जीवन की सच्चाई अक्सर रूमानी नहीं थी, बल्कि उसकी उल्टी होती थी। उनमें से कई औरतों के साथ उनके अंग्रेज मालिक बुरा व्यवहार करते थे।

अफ्रीका में जन्मी भारतीय मूल की इतिहासकार, डा. रोज़ीना विसराम ने इस विषय पर शोध करके कुछ पुस्तकें लिखी हैं। ब्रिटिश राष्ट्रीय पुस्तकालय ने इस विषय में सन् 1600 से ले कर 1947 तक के समय के विभिन्न दस्तावेज़ों को एकत्रित किया है। इनके अनुसार, शुरु में पुरुषों को अधिक लाया जाता था, वह परिवारों के नौकर तथा जहाज़ो में नाविक का काम करते थे। आया का काम करने वाली औरतों के अतिरिक्त, उन्नीसवीं शताब्दी में भारत से बहुत से लोग ईंग्लैंड में पढ़ने के लिए भी आते थे ताकि वापस जा कर भारत में उनको अंग्रेजी सरकार में ऊँचे पदों पर नौकरी मिल सके।


कुछ वर्ष पहले, दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय की इतिहासकार प्रो. राधिका सिन्घा ने दो विश्व युद्धों में अंग्रेज़ी फौजों के साथ भारत से लाये गये सिपाहियों के जीवन पर शोध करके एक किताब लिखी थी जिसमें मैंने भी कुछ सहयोग किया था। उन भुला दिये गये सिपाहियों के अवशेष यूरोप के विभिन्न हिस्से में बिखरे हुए हैं, उनमें से इटली के फोर्ली शहर के एक स्मारक-कब्रिस्तान के बारे में मैंने एक बार लिखा था। हिस्टरी टुडे के भारत से आयी धाय-माँओं के बारे में आलेख ने सामान्य जनों के छुपे और भुलाए हुए इतिहासों के बारे में वैसी ही जानकारी दी। सोच रहा था कि जिन परिवारों की वह बेटियाँ, बहुएँ या माएँ थीं, गाँवों और शहरों में जब वह भारत छोड़ कर गयीं थीं, उस समय उनकी कहानियाँ भी कहानियाँ बनी होंगी, लोगों ने बातें की होंगी, फ़िर समय के साथ वह कहानियाँ लोग भूल गये होंगे। क्या जाने उनके बच्चे और वँशज उनकी स्मृतियों को सम्भाले होंगे या नहीं?

इतिहास ने और अंग्रेज़ों ने उन औरतों के साथ बुरा व्यवहार किया, उनको शोषित किया, लेकिन क्या स्वतंत्र होने के बाद भारत के नये शासक वर्ग ने वैसा शोषण बन्द कर दिया? भारत से विदेश जाने वाले संभ्रांत घरों के लोग अक्सर भारत से काम करने वाली औरतें बुलाते हैं और उन्हें घर में बन्दी बना कर रखते हैं। भारतीय दूतावासों में काम करने वाले लोगों के इस तरह के व्यवहार के बारे में कई बार ऐसी बातें सामने आयीं हैं। भारत के संभ्रांत घरों में नौकरी करने वाली औरतों के साथ भी कई बार गलत व्यवहार होता है। आज के परिवेश में भारत में ही नहीं, अरब देशों में भारतीय काम करने वालों के शोषण की भी अनगिनत कहानियाँ मिल जायेगी। मेरे विचार में जब हम इतिहास में हुए मानव अधिकारों के विरुद्ध आचरणों को देखते हैं तो हमें आज हो रहे शोषण को भी देखने समझने की दृष्टि मिलती है।

टिप्पणींः इस आलेख की सारी तस्वीरें आयाह और आमाह ब्लाग से ली गयीं हैं।

बुधवार, मई 25, 2022

अरे ओ साम्बा, कित्ती छोरियाँ थीं?

भारत में कितनी औरतें हैं यह प्रश्न गब्बर सिंह ने नहीं पूछा था, लेकिन यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है।

कुछ माह पहले भारत सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने 2019 से 2021 के बीच में किये गये राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के नतीजों की रिपोर्ट निकाली थी। इस रिपोर्ट के अनुसार आधुनिक भारत के इतिहास में पहली बार देश में लड़कियों तथा औरतों की कुल जनसंख्या लड़कों तथा पुरुषों की कुल जनसंख्या से अधिक हुई है। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है जिससे देश की सामाजिक, आर्थिक व स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में जानकारी मिलती है। यह भारत के लिए गर्व की बात है। अपने इस आलेख में मैंने इस बदलाव की राष्ट्रीय तथा राज्यीय स्तर पर कुछ विषलेशण करने की कोशिश की है।



नारी और पुरुष जनसंख्या के अनुपात

कुल जनसंख्या में लड़कियों तथा औरतों की संख्या लड़कों तथा पुरुषों की संख्या से अधिक होनी चाहिए। अगर गर्भ में भ्रूण के बनते समय उसका नर या मादा होने के मौके एक बराबर ही होते हैं, तो समाज में नर और नारियों की संख्या भी एक बराबर होनी चाहिये। तो पुरुषों की संख्या औरतों से कम क्यों होती है? इसके कई कारण होते हैं। सबसे पहले हम नर तथा नारी जनसंख्या पर पड़ने वाले विभिन्न प्रभावों को देख सकते हैं। 

नर भ्रूणों को स्वभाविक गर्भपात का खतरा अधिक होता है, इस लिए पैदा होने वाले बच्चों में लड़कियाँ अधिक होती हैं। 

पैदा होने के बाद भी लड़के कई बीमारियों का सामना करने में लड़कियों से कमजोर होते हैं। समूचे जीवन काल में, बचपन से ले कर बुढ़ापे तक, चाहे एक्सीडैंट हों या आत्महत्या, चाहे शराब अधिक पीना हो या नशे की वजह हो, चाहे लड़ाईयाँ हों या सामान्य हिँसा, लड़के व पुरुष ही अधिक मरते हैं। लड़कों व पुरुषों की हड्डियाँ व माँस पेशियाँ अधिक मजबूत होती हैं, वह अधिक ऊँचे और शक्तिशाली होते हैं, लेकिन वह मजबूत शरीर बीमारियों से लड़ने तथा मानसिक दृष्टि से कम शक्तिशाली होते हैं। 

जबकि औरतों के जीवन में सबसे बड़ा स्वास्थ्य से जुड़ा खतरा होता है उनका गर्भवति होना और बच्चे को जन्म देना। पिछड़े व गरीब समाजों में औरतों की उर्वरता दर अधिक होती है, यानि बच्चों की संख्या अधिक होती है। कृषि से जुड़े गरीब समाजों को बच्चों के बाहुबल की आवश्यकता होती है। गरीब देशों की स्वास्थ्य सेवाएँ भी निम्न स्तर की होती हैं, तो बच्चों को टीके नहीं लगाये जाते या बीमार होने पर उनका सही उपचार नहीं हो पाता। इन सब वजहों से गरीब समाजों में बच्चे अधिक होते हैं। इसलिए गर्भवति होने वाली उम्र में गरीब समाजों में नवयुतियों के मरने का खतरा अधिक होता है। जबकि विकसित समाजों में, विषेशकर अगर लड़कियाँ पढ़ी लिखी हों, तो उनके बच्चे देर से पैदा होते हैं और उनकी संख्या कम हो जाती है। 

नारी शरीर की दूसरी कमजोरी का कारण है मासिक माहवारी। अगर उन्हें सही खाना मिलता रहे तो सामान्य माहवारी का उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर नहीं पड़ता, वरना इससे उनके रक्त में लोहे की कमी से अनीमिया होने का खतरा रहता है। लेकिन अगर प्रसव तथा माहवारी से जुड़े खतरों को छोड़ दें तो नारी शरीर में बीमारियों से लड़ने की अधिक शक्ति होती है। नारी शरीर के हारमोन उनकी बहुत सारी बिमारियों से, जैसे कि बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर तथा हृद्यरोग आदि से जब तक माहवारी चलती है, तब तक उनकी रक्षा करते हैं, उन बीमारियों से पुरुष अधिक मरते हैं। बुढ़ापे में भी नारी हारमोन उनकी कुछ हद तक रक्षा करते हैं जिससे कि औरतों की औसत जीवन अपेक्षा पुरुषों से अधिक होती है। 

प्राकृतिक स्वास्थ्य संबंधी कारणों के अतिरिक्त नर-नारी जनसंख्या पर सामाजिक सोच का असर पड़ता है। बहुत से समाजों में लड़कियों को पैदा होने से पहले ही गर्भपात करवा कर मरवा देते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि लड़कों से परिवार और संस्कृतियाँ चलती हैं। पैदा होने के बाद बेटों के तुलना में उन्हें खाना कम दिया जाता है, खेलकूद और पढ़ायी के अवसर कम मिलते हैं। और जब वह बीमार होती हैं तो उनका इलाज देर से करवाया जाता है और कम करवाया जाता है।



देशों में कुल जनसंख्या में नर अधिक होंगे या नारियाँ, उस आकंणे पर ऊपर बताये गये सब भिन्न प्रभावों के नतीजों को जोड़ कर देखना पड़ेगा। विश्व स्तर पर उन आकंणों को देखें तो हम पाते हैं कि विकसित देशों में जनसंख्या में नारियाँ अधिक होती हैं, जबकि कम विकसित तथा गरीब देशों में पुरुषों की संख्या अधिक होती है। जैसे जैसे समाज विकसित होने लगते हैं, औरतें अधिक पढ़ती लिखती हैं, नौकरी करके स्वंतत्र रहने के काबिल बन जाती हैं और आवश्यकता पड़ने पर माता पिता की देखभाल भी कर सकती हैं, तो जनसंख्या में उनका अनुपात बढ़ने लगता है। 

अन्य देशों से नर-नारी अनुपात के कुछ आकंणे

नये भारतीय सर्वेषण के नतीजों को देखने से पहले आईये पहले हम कुछ अन्य देशों में नर-नारी अनुपात की क्या स्थिति है उसको देखते हैं।

इस दृष्टि से पहले दुनिया के कुछ विकसित देशों की स्थिति कैसी है, पहले उसके आकणें देखते हैं। 1000 पुरुषों के अनुपात में देखें तो फ्राँस में 1054 औरतें हैं, जर्मनी में 1039, ईंग्लैंड और स्पेन में 1024, इटली में 1035, अमरीका में 1030, तथा जापान में 1057। यानि हर विकसित देश में लड़कियों व औरतों की संख्या लड़कों तथा पुरुषों की संख्या से अधिक है। 

आईये अब भारत के आसपास के देशों की स्थिति देखें। यहाँ पर 1000 पुरुषों के अनुपात में पाकिस्तान में 986 औरतें हैं, बँगलादेश में 976, नेपाल में 1016, और चीन में 953। यानि नेपाल में स्थिति बेहतर हैं जबकि चीन, पाकिस्तान व बँगलादेश में खराब है। हाँलाकि पिछले दो दशकों में चीन बहुत अधिक विकसित हुआ है लेकिन चीन में अभी कुछ समय पहले तक नियम था कि परिवार में एक से अधिक बच्चे नहीं होने चाहिये, और वहाँ की सामाजिक सोच इस तरह की है जिसमें वह सोचते हैं कि लड़के ही पैदा होंने चाहिए, इसके दुष्प्रभाव पड़े हैं।

विभिन्न देशों के आंकणें देखते समय वहाँ की अन्य परिस्थितयों के असर के बारे में सोचना चाहिये। जहाँ युद्ध हो रहे हैं वहाँ पुरुषों की संख्या और भी कम हो सकती है। कुछ जगहों में पुरुषों को घर-गाँव छोड़ कर पैसा कमाने के लिए दूर कहीं जाना पड़ता है, तो वहाँ भी जनसंख्या में पुरुषों की संख्या कम हो जायेगी, जबकि जिन जगहों पर पुरुष प्रवासी काम खोजने आते हैं, वहाँ पर उनका अनुपात बढ़ जाता है। जब आंकणों में किसी जगह पर बहुत अधिक पुरुष या नारियाँ दिखें तो वहाँ की सामाजिक स्थिति के बारे में अन्य कारणों को समझना आवश्यक हो जाता है।

भारत के राष्ट्रीय स्तर के आंकणे

राष्ट्रीय स्तर पर यह आकंणे सन् 1901 के बाद से जमा किये जाते रहे हैं। चूँकि सौ वर्ष पहले के भारत में आज के पाकिस्तान, बँगलादेश तथा कुछ हद तक मयनमार भी शामिल थे तो उनके आंकणों की आधुनिक भारत के आंकणों से पूरी तरह तुलना नहीं की जा सकती लेकिन उनसे हमारी स्थिति के बारे में कुछ जानकारी तो मिलती है।

1901 में भारत में हर 1000 पुरुषों से सामने 972 औरतें थीं, जबकि 1970 में उनकी संख्या 930 रह गयी थी। 2005-06 में जब तृतीय राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेषण में यह जानकारी जमा की गयी तो भी स्थिति में बदलाव नहीं आया था, 1000 पुरुषों के सामने 939 औरतें थीं। 2015-16 में जब चौथा सर्वेषण किया गया तो पहली बार महत्वपूर्ण बदलाव दिखा जब औरतों की संख्या बढ़ कर 991 हो गयी थी। इस वर्ष आये परिणामों में स्थिति और मजबूत हुई है, इस बार 1000 पुरुषों के मुकाबले में 1020 औरतें हैं।

इन आकंणो से हम क्या निष्कर्श निकाल सकते हैं? मेरे विचार में सौ साल पहले औरतों की संख्या कम होने का कारण था उन्हें खाना अच्छा न मिलना, बच्चे अधिक होना, और प्रसव के समय स्वास्थ्य सेवाओं की कमी। यह सभी बातें 1970 के सर्वेषण तक अधिक नहीं बदली थीं। 1990 के दशक में भारत में विकास बढ़ा, साथ में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहतर हुई लेकिन साथ ही गर्भवति औरतों के लिए अल्ट्रासाँऊड टेस्ट कराने की सुविधाएँ भी तेजी सी बढ़ी जिनसे परिवारों के लिए होने वाले बच्चे का लिंग जानना बहुत आसान हो गया, जिससे बच्चियों की भ्रूण बहुत अधिक संख्या में गिरवाये जाने लगे। इसका असर 2005-06 के सर्वेषण पर पड़ा और बच्चे कम होने, भोजन बेहतर होने व स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर होने के बावजूद औरतों की संख्या कम ही रही।

भारत में बच्चियों का गर्भपात

हालाँकि भारत सरकार ने गर्भवति औरतों में अल्ट्रासाऊँड टेस्ट से लिंग ज्ञात करने की रोकथाम के लिए 1994 से कानून बनाया था, इसे 2005-06 के सर्वेषण के बाद सही तरह से लागू किया गया जब डाक्टरों पर सजा को बढ़ाया गया। लेकिन सामाजिक स्तर पर भारत में बेटियों की स्थिति अधिक नहीं बदली, इस कानून का भी कुछ विषेश असर नहीं पड़ा है।

भारत में बच्ची होने पर गर्भपात कराने की परम्परा अभी महत्वपूर्ण तरीके से नहीं बदली, यह हम एक अन्य आंकणे से समझ सकते हैं - छः वर्ष से छोटे बच्चों में लड़कों और लड़कियों के अनुपात को देखा जाये। 2001 में छः वर्ष से छोटे बच्चों की जनसंख्या में हर 1000 लड़कों के सामने 927 लड़कियाँ थीं। 2005-06 में यह संख्या घट कर 918 हो गयी। 2015-16 में यह संख्या बदली नहीं थी, 919 थी। और, 2019-21 के नये सर्वेषण में भी यह अधिक नहीं बदली, 924 है।

इसका अर्थ है कि औरतों की संख्या में बढ़ोतरी का बदलाव जो 2019-21 के सर्वेषण में दिखता है वह अन्य वजहों से हुआ है जैसे कि उन्हें पोषण बेहतर मिलना, छोटी उम्र में विवाह कम होना, विवाह के बाद बच्चे कम होना और प्रसव के समय बेहतर स्वास्थ्य सेवा मिलना।

ग्रामीण तथा शहरी क्षत्रों में अंतर

राष्ट्रीय स्तर पर और बहुत से प्रदेशों में ग्रामीण क्षेत्रों में औरतों की स्थिति शहरों से बेहतर है। राष्ट्रीय स्तर पर 1998-99 में 1000 पुरुषों के अनुपात में शहरी क्षेत्रों में 928 औरतें थीं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी संख्या 957 थी। बाईस साल बाद, 2019-21 के सर्वेषण में राष्ट्रीय स्तर के आंकणों में दोनों क्षेत्रों में स्थिति सुधरी है, शहरों में उनकी संख्या 985 हो गयी है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में संख्या 1037 हो गयी है।

लेकिन यह बदलाव बड़े शहरों से जुड़े ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं आया। दिल्ली, चंदीगढ़, पुड्डूचेरी जैसे शहरों के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में औरतों की संख्या शहरों से कम है। यह आंकणे देख कर मुझे लगा कि इन क्षेत्रों में स्थिति को समझने के लिए विषेश शोध किये जाने चाहिये। एक कारण हो सकता है कि यहाँ बच्चियों का गर्भपात अधिक होता हो? शायद उससे भी बड़ा कारण है कि देश के अन्य राज्यों से आने वाले प्रवासी युवक इन गाँवों में सस्ती रहने की जगह पाते हैं जिसकी वजह से यहाँ पुरुषों की संख्या अधिक हो जाती है?

अन्य कुछ बातें भी हैं। जैसे कि सामान्य सोच है कि गाँवों में समाज अधिक पाराम्परिक या रूढ़िवादी होते हैं, वहाँ सामाजिक सोच को बदलने में समय लगता है। वहाँ स्वास्थ्य सेवाओं को पाना भी कठिन हो सकता है, हालाँकि प्राथमिक सेवा केंद्रों तथा आशा कर्मियों से बहुत जगहों पर स्थिति में बहुत सुधार आया है। लेकिन इन सबको ठीक से समझने के लिए विषेश शोध होने चाहिये।

राज्य स्तर के आंकणे

अंत में राज्य स्तर के आंकणों के बारे में कुछ जानकारी प्रस्तुत है। जैसा कि मैंने ऊपर बताया है, इन आंकणों पर अन्य बहुत सी बातों का असर पड़ता है इसलिए उनके महत्व को ठीक से समझने के लिए सावधानी बरतनी चाहिये।

मेरे विचार में राज्यों की स्थिति को देश के विभिन्न भागों में बाँट कर देखना अधिक आसान है। मैंने राज्यों को चार भागों में बाँटा है - पहले भाग में हैं उत्तरपूर्व को छोड़ कर उत्तरी व मध्य भारत की सभी राज्य; दूसरे भाग में मैंने दक्षिण भारत के राज्यों को रखा है, जिनमें गोवा भी है; तीसरा भाग है उत्तरपूर्व के राज्य जिनमें सिक्किम भी है; और चौथा भाग है केन्द्रीय प्रशासित क्षेत्र जैसे कि अँडमान या चँदी गढ़, इनमें दिल्ली भी है।

उत्तर तथा मध्य भारत के राज्य

2015-16 के आंकणों के अनुसार, उत्तर व मध्य भारत में सात राज्यों में औरतों की संख्या की स्थिति नकरात्मक थी - हरियाणा 876, राजस्थान 887, पँजाब 905, गुजरात 950, महाराष्ट्र 952, एवं जम्मु कश्मीर में 971। उत्तरप्रदेश में स्थिति बाकियों के मुकाबले में कुछ ठीक थी, 995। बाकी के सभी प्रदेशों में (झारखँड, पश्चिम बँगाल, उत्तरखँड, छत्तीसगढ़, ओडीशा, बिहार व हिमाचल प्रदेश) में औरतों की संख्या पुरुष अनुपात में 1000 से अधिक थी, उनमें से सबसे उच्चस्थान पर थे बिहार 1062 तथा हिमाचल प्रदेश 1087।

2019-21 के आंकणें देखें तो कुछ बदलाव दिखते हैं। जम्मू कश्मीर को छोड़ कर अन्य सभी राज्यों में स्थिति में कुछ सुधार आया है, हालाँकि पँजाब व राजस्थान में सुधार की मात्रा थोड़ी सी ही है। इन परिवर्तनों के बाद सबसे अधिक नकारात्मक स्थितियाँ इन राज्यों में हैं - राजस्थान 891, हरियाणा 926, पँजाब 938, जम्मू कश्मीर 948, गुजरात 965, महाराष्ट्र 966, और मध्यप्रदेश 970। बाकी सभी राज्यों में औरतों का अनुपात 1000 से ऊपर है। सबसे बेहतर स्थिति है ओडीशा में 1063 तथा बिहार में 1090। मेरे विचार में जिन राज्यों में स्थिति सकारात्मक दिखती है वहाँ के आंकणों पर अधिक पुरुषों के प्रवासी होने का भी प्रभाव है।

दक्षिण भारत के राज्य

गोवा सहित दक्षिण भारत के राज्यों में 2015-16 में स्थिति केवल कर्णाटक में नकारात्मक थी, 979, बाकी सभी राज्यों में स्थिति सकारात्मक थी।

2019-21 के सर्वेक्षण में इन सभी राज्यों में स्थिति सकारात्मक हो गयी थी।

उत्तरपूर्वी भारत के राज्य

उत्तरपूर्वी भारत के आठ राज्यों में से 2015-16 में 3 राज्यों में स्थिति नकारात्मक थी - सिक्किम 942, अरुणाचल 958 तथा नागालैंड 968। दो राज्यों में स्थिति थोड़ी सी नकारात्मक थी, असम में 993 और त्रिपुरा में 998, जबकि मेघालय, मिजोरम तथा मणीपुर में स्थिति सकारात्मक थी।

इस बार के 2019-21 सर्वेक्षण में इन सभी राज्यों में स्थिति सुधरी है, हालाँकि अभी भी सिक्किम में 990 तथा अरुणाचल में 997 होने से थोड़ी सी नकारात्मक है।

दिल्ली तथा केन्द्र प्रशासित भाग

अंत में दिल्ली तथा केन्द्र प्रशासित भागों में देखें तो 2015-16 में चार क्षेत्रों में स्थिति गम्भीर थी - दादरा, नगर हवेली, दमन, दीव 813, दिल्ली 854, चंदीगढ़ 934 तथा अँडमान 977। सभी जगहों पर इन क्षेत्रों के ग्रामीण हिस्सों की स्थिति और भी गम्भीर थी, जिसका एक कारण अन्य राज्यों से आने वाले प्रवासी पुरुष हो सकता है।

2019-21 में स्थिति में कुछ सुधार हुआ और कुछ स्थिति और भी नकारात्मक हुई - दादरा, नगर हवेली आदि 827, दिल्ली 913, चंदीगढ़ 917, अँडमान 963, लदाख 971। अँडमान में कितने प्रवासी है, वहाँ क्या कारण हो सकते हैं, उसके आंकणों से मुझे थोड़ी हैरानी हुई।


अंत में

अगर हम पूरे भारत के स्तर पर विभिन्न राज्यों में नारी और पुरुष जनसंख्या के अनुपात में आये परिवर्तनों को देखें तो पाते हैं कि बहुत राज्यों में स्थिति सुधरी है, विषेशकर लक्षद्वीप, केरल, कर्णाटक, तमिलनाडू, हरियाणा, सिक्किम, झारखँड, नागालैंड तथा अरुणाचल में। कुछ जगहों पर अनुपात कुछ घटा है जैसे कि हिमाचल प्रदेश, हालाँकि कुछ स्थिति अभी भी सकारात्मक है।

राज्य स्तर के आंकणों में आने वाले बदलावों को ठीक से समझना आसान नहीं है क्योंकि उस पर अन्य कारणों के साथ साथ पुरुषों के काम की खोज में अन्य राज्यों में जाने से भी बहुत असर पड़ता है। इसकी वजह से समृद्ध राज्य जहाँ प्रवासी आते हैं उनकी पुरुष संख्या बढ़ी दिखती है और पिछड़े राज्य, जहाँ से पुरुष प्रवासी बन कर निकलते हैं, उनके आंकड़े सच्चाई से बेहतर दिखते हैं।

राज्यों की स्थिति चाहे जो भी हो, राष्ट्रीय स्तर पर भारत की जनसंख्या में औरतों के अनुपात में इस तरह से बढ़ौती बहुत सकारात्मक बदलाव है। केवल एक आंकणे पर अधिक बातें कहना सही बात नहीं होगी, उसके लिए हमें स्वास्थ्य से संबंधित अन्य आंकणों को देखना पड़ेगा। लेकिन यह स्थिति भारत को विकास की ओर बढ़ाने में यह सही राह पर होने का आभास देती है।

बुधवार, अगस्त 23, 2017

उत्तरप्रदेश में लड़कियाँ क्या सोचती हैं?

हिन्दी फ़िल्में देखिये तो लगता है कि छोटे शहरों में रहने वाली लड़कियों के जीवन बदल गये हैं. "बरेली की बरफ़ी", "शुद्ध देसी रोमान्स", और "तनु वेड्स मनु" जैसी फ़िल्मों में, छोटे शहरों की लड़कियों को न सड़कों पर डर लगता हैं, न वह लड़कों से वे स्वयं को किसी दृष्टि से पीछे समझती हैं. जाने क्यों, अक्सर पिछले कुछ सालों से हमारी फ़िल्मों में छोटे शहरों की लड़कियों की आधुनिकता को सिगरेट पीने से दिखाया जाता है (शायद इन फ़िल्मों को सिगरेट कम्पनियों से पैसे मिलते होंगे, क्योंकि अब भारत में सिगरेट के अन्य विज्ञापन दिखाना सम्भव नहीं)

हिन्दी फ़िल्मों की लड़कियों और सचमुच की लड़कियों के जीवनों में कोई अन्तर हैं, तो कौन से हैं? पिछले दशकों में छोटे शहरों में रहने वाली लड़कियों और युवतियों की सोच बदली है, तो कैसे बदली है? और अगर बदली है तो उसका उन सामाजिक समस्याओं पर क्या असर पड़ा है जो कि लड़कियों के जीवनों से जुड़ी हुई हैं? इस आलेख में इसी बात से सम्बंधित सर्वे की बात करना चाहता हूँ.

गाँव कनक्शन का सर्वे

इन दिनों में गाँव कनक्शन पर उत्तरप्रदेश की 15 से 45 वर्षीय महिलाओं के साथ हुए एक सर्वे के बारे में छपा है. इस सर्वे में पाँच हज़ार औरतों ने भाग लिया.

सर्वे में 56 प्रतिशत महिलाओं कहा कि वह नौकरी करना चाहती हैं. इसमें से सबसे अधिक महिलाएँ स्कूल में अध्यापिका बनना चाहती हैं.  14 प्रतिशत महिलाएँ डॉक्टर बनना चाहती हैं और 6 प्रतिशत पुलिस में जाना चाहती हैं.

67 प्रतिशत ने कहा कि अगर मौका मिले तो वह और पढ़ना चाहेंगी. 50 प्रतिशत महिलाओं-लड़कियों ने कहा कि उन्हें साइकिल चलाना पसंद है, लेकिन ससुराल में साइकिल चलाने की अनुमति कम ही मिलती है. 67 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें घर से बाहर निकलने के लिए पति या पिता से अनुमति लेनी पड़ती है, जबकि 15 प्रतिशत ने बताया कि वह घर से बाहर किसी के साथ ही जा सकती हैं.

81 प्रतिशत लड़कियों ने कहा कि वह जानती हैं कि उनकी शादी के समय उनके माता-पिता को दहेज देना पड़ेगा।

उत्तरप्रदेश में मेरा सर्वे

गाँव कनक्शन के इस सर्वे की लड़कियों-महिलाओं के जीवन, उनकी आशाएँ, और उनके सपने, फ़िल्मी छोटे शहरों की लड़कियों के जीवनों से बहुत भिन्न लगती हैं.

इस सर्वे के बारे में पढ़ कर मुझे अपना एक सर्वे याद आ गया. 2014 में, मैं उत्तरप्रदेश में कुछ दिन अपनी एक मित्र के पास ठहरा था जिनका एक प्राईवेट अस्पताल था और साथ में नर्सिंग ट्रेनिन्ग कॉलिज भी था जहाँ तीन वर्ष का नर्सिन्ग कोर्स होता था. वहाँ पढ़ने वालों को उत्तरप्रदेश सरकार की ओर से छात्रवृत्ति मिल रही थी. मैंने इस सर्वे में द्वितीय वर्ष के छात्र-छात्राओं से स्वास्थ्य सम्बंधी तथा सामाजिक विषयों के प्रश्न पूछे थे.

सर्वे करने से पहले उसके प्रश्नों को तीसरे वर्ष के तीन छात्राओं में जाँचा गया और जाँच के अनुसार, जो प्रश्न अस्पष्ट थे या जिनके सही अर्थ समझने में छात्रों को कठिनाई हो रही थी, उन्हें सुधारा गया. किसी छात्र या छात्रा ने सर्वे में भाग लेने से मना नहीं किया, लेकिन करीब 20 प्रतिशत छात्राओं ने कुछ प्रश्नों के उत्तर नहीं दिये.

सर्वे में भाग लेने वाले

कुल 35 छात्रों ने सर्वे में हिस्सा लिया जिनमें 31 छात्राएँ (89%) थीं और 4 छात्र थे. चूँकि सर्वे में पुरुष छात्र केवल चार थे, उनके उत्तरों का अलग से विश्लेषण नहीं किया गया है.


छात्रों की औसत आयू 21.7 वर्ष थी. उनमें से 33 लोग (94%) उत्तरप्रदेश से थे और 2 लोग अन्य करीबी राज्यों (बिहार तथा उत्तराखँड) से थे.

उत्तरप्रदेश के 33 लोगों में से 9 लोग (27%) लखनऊ से थे. बाकी के 24 लोग (73%) राज्य के 8 जिलों से थे (सीतापुर, बलिया, माउ, बस्ती, अकबरपुर, एटा, लक्खिमपुर तथा बाराबँकी). जिलों से आने वाले लोग जिला शहरों, उपजिलों के छोटे शहरों तथा गाँवों के रहने वाले थे. यानि सर्वे में प्रदेश की राजधानी से ले कर, गाँवों तक के, हर तरह की जगहों के लोग थे.

उनमें से 33 लोग (94%) हिन्दू थे, केवल 1 व्यक्ति मुसलमान परिवार से था और 1 ईसाई परिवार से. हिन्दू छात्रों में 20 लोग (60%) शिड्यूल कास्ट जातियों से थे और 6 लोग (18%) जनजातियों से थे.

छात्रों में से 19 लोग (54%) संयुक्त परिवारों में रहते थे, जबकि 16 लोग (46%) ईकाई (nuclear) परिवारों से थे.

छात्र परिवारों की आर्थिक स्थिति

उनमें से 32 लोगों (91%) ने खुद को मध्यम वर्गीय बताया, केवल 2 लोगों ने खुद को निम्न मध्यम वर्गीय कहा और 1 ने खुद को उच्च मध्यम वर्गीय कहा. उनमें से 18 लोगों (51%) के घर में स्कूटर, मोटरसाईकल या ट्रेक्टर थे जबकि बाकी के 17 लोगों (49%) के घर बैलगाड़ी या साईकल थी या कोई व्यक्तिगत यात्रा साधन नहीं था.

उनमें से अधिकाँश के घर में टीवी था, जबकि करीब 50% लोगों के घर में फ्रिज था.

इसका अर्थ है कि हालाँकि अधिकाँश लोग अपने आप को मध्यम वर्ग को कह रहे थे, उनमें से करीब पचास प्रतिशत लोगों की आर्थिक स्थिति कमज़ोर थी.

पढ़ायी और अंग्रेज़ी ज्ञान

नर्सिंग कॉलिज में आने से पहले 34 छात्रों ने 12 कक्षा तक पढ़ाई की थी, केवल एक छात्रा के पास बीए की डिग्री थी.

छात्रों की माओं ने औसत 6 वर्ष की स्कूली पढ़ायी की थी, उनमें से 34% अनपढ़ थीं  और 11% के पास कॉलिज की डिग्री थीं. उनके पिताओं की औसत पढ़ायी 11 वर्ष की थी, उनमें से 11% अनपढ़ थे और 42% कॉलिज में पढ़े थे.

सब छात्रों ने स्वीकारा कि उनके माता पिता की पीढ़ी में पढ़ने के क्षेत्र में पुरुषों तथा महिलाओं के बीच में अधिक विषमताएँ थीं जो उनकी पीढ़ी में कम हो गयीं थीं. कई छात्राएँ जिनकी माएँ अनपढ़ थीं, बोलीं कि उनको अपनी माँ से पढ़ाई करने का बहुत प्रोत्साहन मिला था. एक छात्रा ने कहा, "मेरी माँ बचपन से मुझे कहती थी कि तुमको पढ़ना है, मेरी तरह अनपढ़ नहीं रहना."

छात्रों में से 19 लोगों (54%) ने कहा कि उनकी अंग्रेज़ी कमज़ोर थी जिससे उन्हें नर्सिंग की किताबों को पढ़ने व समझने में दिक्कत होती थी. उन्होंने बताया कि कुछ शिक्षकाएँ अक्सर अपनी बात को समझाने के लिए उसे हिन्दी में भी समझाती थी, जिससे उन्हें आसानी हो जाती थी.

बाकी के 16 लोगों ने कहा कि उनकी अंग्रेज़ी अच्छी थी और उन्हें नर्सिन्ग की किताबें पढ़ने समझने में दिक्कत नहीं होती थी. लेकिन उनसे जब सर्वे के दौरान अंग्रेज़ी में प्रश्न पूछे गये तो केवल एक छात्रा ही उसका सही अंग्रेज़ी में पूरा उत्तर दे पायी. बाकी लोगों को अंग्रेज़ी बोलने में कठिनाई थी. यानि जब छात्र अंग्रेज़ी की किताबों को पढ़ तथा समझ सकते हैं, तब भी उन्हें अंग्रेज़ी बोलने में हिचक या कठिनाई हो सकती है. इसका यह भी अर्थ है कि अंग्रेज़ी में उनकी अभिव्यक्ति कमज़ोर रहती है.

नर्सिंग पढ़ने का निर्णय किसने लिया

19 लोगों (54%) ने नर्सिंग की पढ़ायी करने का निर्णय स्वयं लिया था, जबकि बाकी 16 (46%) लोगों में यह निर्णय परिवार या अन्य लोगों ने लिया.

अधिकाँश लोगो ने माना कि उनके मन में कुछ अन्य पढ़ने की कामनाएँ थीं लेकिन उन्होंने अंत में नर्सिन्ग को चुना क्योंकि इसमें छात्रवृत्ति मिलती है, वरना उनके परिवार के लिए उनकी पढ़ायी का खर्चा पूरा कठिन होता. नर्सिन्ग पढ़ने का एक कारण यह भी था कि इस काम में नौकरी आसानी से मिल जाती है.

केवल दो लोगों ने कहा कि वह सचमुच नर्सिन्ग की पढ़ायी ही करना चाहते थे. 15 लोगों (43%) का कहना था कि वह शिक्षक बनना चाहते थे. 4 लोगों (11%) ने कहा कि वह पुलिस में काम करना चाहते थे. बाकी के लोगों की अलग अलग राय थी, कोई फेशन डिज़ाईनर बनना चाहता था, कोई ब्यूटी पार्लर चलाना चाहता था, कोई कम्पयूटर कोर्स तो कोई वकील या एकाऊँटेन्ट. उनमें से एक छात्रा ने कहा कि नर्सिन्ग की पढ़ायी पूरी करके वह आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलिज में पढ़ने की कोशिश करेगी.

विवाह और जीवन साथी का चुनाव

छात्रों में से 5 लोग विवाहित थे, वह पाँचों छात्राएँ थीं और पाँचों के पति परिवार ने चुने थे.

बाकी 30 लोगों में से 24 (80%) ने कहा कि उनका जीवन साथी परिवार चुनेगा. केवल 6 लोगों ने कहा कि वह अपना जीवन साथी स्वयं चुनना चाहेंगे, पर उनकी भी चाह थी कि उनका चुना जीवनसाथी उनके परिवार को पसंद आना चाहिये और वे परिवार की मर्ज़ी के विरुद्ध जा कर विवाह नहीं करना चाहेंगे. केवल एक छात्रा ने कहा कि चाहे उसका परिवार कुछ भी कहे, वह तो उसी से विवाह करेगी जो उसे पसंद होगा, और इसके लिए वह परिवार के विरुद्ध भी जा सकती है.

जाति और भेदभाव के अनुभव

केवल 6 लोगों (17%) ने कहा कि उनको जाति सम्बंधित भेदभाव के व्यक्तिगत अनुभव हुए थे। अन्य 9 लोगों (26%) ने कहा कि उनको स्वयं ऐसा कोई अनुभव नहीं हुआ लेकिन उनके परिवार में अन्य लोगों को ऐसे अनुभव हुए.

33 लोगों (95%) ने स्वीकारा कि समाज में जाति से सम्बंधित भेदभाव होता है.

भेदभाव के विषय पर बात करते समय कई छात्रों ने कहा कि नर्सिन्ग होस्टल में रहने की वजह से उनके जाति सम्बंधी विचार बदल गये थे. एक छात्रा ने कहा, "घर में कुछ भी कहते थे तो हम मान लेते थे. लेकिन होस्टल में हम लोग जात पात की बात नहीं सोचते, साथ बैठते, साथ खाना खाते हैं. अलग जाति की लड़कियाँ मेरी मित्र हैं, इससे जाति के बारे में मेरी सोच बदल गयी है."

साथ ही अधिकाँश लोगों का कहना था कि चाहे उनकी अपनी सोच बदल गयी है लेकिन जब वह घर जाते हैं और घर में बड़े बूढ़े लोग जाति का भेदभाव करते हैं तो वह उसका विरोध नहीं कर पाते. एक विवाहित छात्रा ने कहा, "मेरी सास जात-पात को बहुत मानती हैं, मैं अपने घर में किसी अन्य जाति के मित्र को नहीं बुला सकती. जब तक उनके साथ रहूँगी तो उनकी बात ही माननी पड़ेगी. मैं उनसे झगड़ा नहीं कर सकती."

उनसे कहा गया कि मान लीजिये की आप की सहेली या दोस्त अपनी जाति से भिन्न जाति या धर्म के व्यक्ति से प्रेम करता है और उससे विवाह करना चाहता है, लेकिन उसका परिवार इसके विरुद्ध है. आप किसकी तरफ़ होंगे, अपनी सहेली या दोस्त की ओर या उसके परिवार की ओर?

3 लोगों ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं देना चाहा. बाकी के 32 लोगों में से 21 (66%) ने कहा कि परिवार ठीक कहता है, जाति या धर्म से बाहर के व्यक्ति से विवाह करना उचित नहीं होगा, बाकी के 11 (34%) लोगों ने कहा कि जो जिससे प्रेम करता है उसे उसी से विवाह करना चाहिये.

घरेलू हिँसा

छात्रों से कहा गया कि मान लीजिये कि एक महिला का पति शाम को थका हुआ घर लौटा. देखा कि पत्नी की सहेली आयी थी, वह उससे बातें कर रही थी और उसने खाना नहीं बनाया था. अगर इस स्थिति में वह अपनी पत्नी को मारे तो क्या आप की राय में वह ठीक है?

10 लोगों (29%) का कहना था कि इस स्थिति में पति का पत्नी को मारना ठीक था. 25 (71%) लोगों ने कहा कि पति का मारना गलत था.

उन 25 में से 11 लोगों (44%) ने कहा कि पति को पहले पत्नी से बात करनी चाहिये थी. अगर ऐसा पहली बार हुआ हो या फ़िर अगर वह पत्नी की विषेश सहेली थी जिससे बहुत सालों से नहीं मिली थी, तो पति को इस बात को समझना चाहिये था कि कभी कभी पत्नी से भूल हो सकती है और उसे मारने की बजाय प्यार से समझाना चाहिये था. लेकिन अगर समझाने के बावज़ूद पत्नी बार बार ऐसा करती है तो उन्होंने कहा कि तब पति का उसे मारना सही है. यानि कुल 70% लोग यह मान रहे थे कि कई परिस्थितियों में पति का पत्नी को मारने को सही समझा जा सकता है.

केवल 7 लोगों (20%) ने कहा कि किसी भी हालत में पति को पत्नी को मारने का अधिकार नहीं है.

इस विषय पर बात करते हुए उनसे पूछा गया कि क्या पत्नी हिँसा करे तो वह सही मानी जा सकती है? मान लीजिये कि पत्नी काम पर गयी है, शाम को थकी हुई घर लौटी है. पति को उस दिन काम पर नहीं जाना था, वह सारा दिन घर पर ही था. पत्नी देखती है कि सारा घर गन्दा पड़ा है, खाना भी नहीं बना. पति के मित्र आये हैं, उनकी ताश और शराब चल रही है और पति ने जूए में बहुत पैसा खो दिया है. क्या ऐसी हालत में पत्नी पति से झगड़ा कर सकती है या उसे मार सकती है?

4 लोगों ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं देना चाहा. बाकी 31 में से 26 लोगों (84%) ने कहा कि नहीं पत्नी को लड़ना या हिँसा नहीं करनी चाहिये. उनमें से अधिकतर का कहना था कि पति तो भगवान बराबर होता है, पत्नी को उसका सम्मान करना होता है, वह उस पर किसी भी हालत में हाथ नहीं उठा सकती.

तो ऐसी हालत में पत्नी को क्या करना चाहिये? अधिकतर लोगों का कहना था कि अगर पति अक्सर ऐसा करता हो कि हर महीने घर का पैसा जूए और नशे में गँवा देता हो तो ऐसे पति को सुधारने के लिए घर के बड़े बूढ़ों को कहना चाहिये, उन्हें ही कुछ करना पड़ेगा.

5 लोगों (16%) ने कहा कि इस हालत में पत्नी का पति से लड़ना सही है और अगर यह बार बार हो तो ऐसे पति से तलाक भी ले सकते हैं.

परिवार में लड़कियों के प्रति भेदभाव

12 लोगों (34%) ने कहा कि उन्हें अपने परिवार में उन्होंने लड़को तथा लड़कियों के प्रति व्यवहार में भेदभाव का व्यक्तिगत अनुभव था.

32 लोगों ने माना कि समाज में लड़के तथा लड़कियों के प्रति  भेदभाव आम होता है. 10 लोगों (29%) ने, वह सभी लड़कियाँ थीं, इस भेदभाव को सही बताया.

उनसे कहा गया कि मान लीजिये कि एक घर में शाम को लड़का बाहर जाना चाहता है, परिवार में उसे कोई मना नहीं करता. लेकिन जब उस लड़के की हमउम्र बहन शाम को बाहर जाना चाहती है तो परिवार उसे मना करता है, कहता है कि लड़कियों को घर से बाहर जाने में खतरा है. क्या आपकी राय में यह सही है या गलत?

3 लोगों ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं देना चाहा. बाकी के 32 लोगों में से 24 (75%) ने कहा कि परिवार सही करता है क्योंकि लड़कियों के लिए शाम को बाहर जाने में खतरा है. केवल 8 लोगों (25%) ने कहा कि लड़कियों पर इस तरह रोक लगाना सही बात नहीं हैं.

फ़िर उनसे कहा गया कि मान लीजिये कि आप की सहेली का विवाह हो चुका है, उसकी एक बेटी है और वह फ़िर से गर्भवति हैं. उसका अल्ट्रासाउँड टेस्ट बताता है कि अगली भी बेटी होगी. उसकी सास कहती है कि गर्भपात करा दो. आप उसे क्या राय देंगी?

11 लोगों (31%) ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया. बाकी के 24 लोगों में से 12 लोगों (50%) ने कहा कि सास की बात माननी पड़ेगी. 12 लोगों ने कहा कि उनकी सलाह होगी कि गर्भपात नहीं कराया जाये. दो छात्राओं ने कहा कि वह अपनी सहेली की सास  को समझाने की कोशिश करेंगी.

सरकारी व प्राईवेट अस्पताल

छात्रों के अनुसार सरकारी अस्पतालों में अच्छी बाते हैं कि वहाँ कोई फीस नहीं होती, दवा भी निशुल्क होती है, स्पेशेलिस्ट डाक्टर अधिक होते हैं और सुविधाएँ अधिक होती हैं. उनकी बुरी बाते हैं कि वहाँ देखभाल अच्छी नहीं होती, अक्सर दवाईयाँ नहीं मिलती, सुविधाएँ नाम की होती हैं पर काम नहीं करती, कर्मचारी लापरवाह होते हैं, सफाई की कमी होती है, डाक्टर काम पर नहीं आते और बहुत भीड़ होती है.

प्राईवेट अस्पतालों में अच्छी बाते हैं कि वहाँ देखभाल बेहतर होती है, कर्मचारी ज़्यादा ध्यान से काम करते हैं, सफाई बेहतर होती है, भीड़ कम होती है और जो भी सुविधाएँ होती हैं वह ठीक से काम करती हैं. उनकी बुरी बातें हैं कि वहाँ पैसे बहुत लगते हैं, अक्सर बिना जरूरत के टेस्ट किये जाते हैं, बिना ज़रूरत की दवाएँ दी जाती हैं, और अगर आप गरीब हैं तो आप को कोई नहीं पूछता.

उनसे पूछा गया कि अगर आप बीमार हों तो आप कहाँ जाना चाहेंगे, सरकारी अस्पताल में या प्राईवेट अस्पताल में? 34 लोगों (97%) ने कहा कि अगर वह बीमार होंगे तो वह प्राईवेट अस्पताल में जाना चाहेंगे.

उनसे पूछा गया कि नर्सिंग की ट्रेनिन्ग पूरी होने के बाद आप सरकारी अस्पताल में काम करना चाहेंगे या प्राईवेट अस्पताल में? 34 लोगों (97%) ने कहा कि वे सरकारी अस्पताल में काम करना चाहेंगे. इसके कारण थे कि सरकारी काम में रहने के लिए घर मिलना, सेवा निवृति पर पैंशन मिलना, काम से छुट्टी लेना अधिक आसान है, काम करना भी अधिक आसान है और नौकरी से निकलना बहुत कठिन है.

यानि अपनी बीमारी हो या परिवार की तो लोग प्राईवेट अस्पताल में जाना पसंद करते हैं जबकि नौकरी सरकारी अस्पताल में करना चाहते हैं. पर इस बात में उत्तरप्रदेश के नवजवान लोग बाकी भारत जैसे ही है. अप्रैल 2017 में सी.एस.डी.एस. ने भारत के विभिन्न राज्यों में रहने वाले नवजवानों का सर्वे किया था, उस में भी केवल 7 प्रतिशत लोगों ने प्राईवेट सेक्टर में नौकरी को प्राथमिकता दी थी.

सर्वे में मिले उत्तरों पर विमर्श

जनसंख्या की दृष्टि से देखें तो अगर उत्तरप्रदेश स्वतंत्र देश होता तो दुनिया में पाँचवें स्थान पर होता. विश्व स्तर पर मानव विकास मापदँड की दृष्टि से देखें तो भारत काफ़ी नीचे है, स्वास्थ्य के कुछ आकणों में हमारी स्थिति बँगलादेश से भी पीछे है.

भारत के विभिन्न राज्यों के मानव विकास मापदँडों को देखें तो उत्तरप्रदेश का स्थान अन्य राज्यों की तुलना में बहुत नीचे है. चाहे वह बच्चियों के भ्रूणों की हत्या हो या वार्षिक बाल मृत्यू दर, उत्तरप्रदेश में इनकी स्थिति दयनीय है. स्वास्थ्य के कई आँकणों में उत्तरप्रदेश की स्थिति अफ्रीका के गरीब और पिछड़े देशों जैसी है या उनसे भी बदतर है.

ऐसी हालत में यह जानना कि उत्तरप्रदेश की युवा पीढ़ी क्या सोचती है, महत्वपूर्ण है. आज की नर्सिन्ग छात्राएँ कल यहाँ की स्वास्थ्य सेवाओं में हिस्सा लेंगी, परिवारों को सलाह देंगी. उनकी सोच तथा आचरण से समाज के अन्य लोग भी प्रभावित होंगे.

तो आप के विचार में नर्सों से की मेरी बातचीत उत्तरप्रदेश के भविष्य के बारे में हमें क्या बताती है? कुछ दिन पहले गोरखपुर के अस्पताल में 60 बच्चों की मृत्यू से भारत के समाचार पत्रों में हल्ला मचा था, पर उत्तरप्रदेश के लिए यह कोई नयी बात नहीं है. वहाँ के पिछले दस वर्षों के आँकणे देखिये, हर साल वहाँ दस्त, न्योमोनिया, एन्सेफलाईटस, मलेरिया आदि बीमारियों से लाखों बच्चे मरते हैं, जिनका सही समय पर इलाज किया जाये तो वह बच्चे बच सकते हैं.

यही है भारत की अपने भीतर की विषमताएँ - भारत के दक्षिण के कुछ राज्यों के स्वास्थ्य आँकणे अमरीका जैसे हैं, और उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखँड जैसे राज्यों के अफ्रीका जैसे.

हमारी कथनी और करनी में भी अंतर है. पाराम्परिक विचारों को बदलना आसान नहीं है. अगर हम पूछें कि क्या आप नारी पुरुष में बराबरी में विश्वास करते हैं, तो सब लोग हाँ कह देते हैं. अगर आप पूछते हैं कि घर और परिवार में नारी के साथ होने वाली हिँसा गलत है, तो भी सब लोग हाँ कह देते हैं. लेकिन इन विचारों की कहनी और प्रतिदिन के जीवन की करनी में विरोधाभास है. हम लोग कहते कुछ हैं, करते कुछ और.

इसका यह अर्थ नहीं कि सकारात्मक बदलाव नहीं हुए है. माता और पिता की पढ़ायी के आँकणे दिखाते हैं कि शिक्षा के स्तर में पिछली पीढ़ी में बहुत भेदभाव था. सर्वे में भाग लेने वाले की करीब एक तिहाई माएँ अनपढ़ थीं. इस दृष्टि से सर्वे की युवतियाँ उन घरों में पढ़ने लिखने वाली युवतियों की पहली पीढ़ी हैं. शायद उनकी बेटियों में कथनी और करनी के यह विरोधाभास कम होंगे, वह लोग पारिवारिक हिँसा और भेदभाव के विरुद्ध आवाज़ उठायेंगी.

अंत में

इस सर्वे से मुझे लगा कि सामाजिक विचारों को बदलना आसान नहीं है. हम जितने स्लोगन बना लें, पोस्टर बना लें, लोगों कों जानकारी हो जाती है लेकिन इससे उनके विचार या आचरण नहीं बदलते. ऊपर से दिखावे के लिए हम कुछ भी कह दें लेकिन हमारी भीतरी सोच क्या है, यह कहना समझना कठिन है.

मैं उम्र में उन नर्सिंग के छात्रों से बहुत बड़ा था, बाहर से आया था और पुरुष था. इसलिए यह नहीं कह सकते कि उन्होंने हर बात का जो सोचते हैं वही सच सच उत्तर दिया होगा. फ़िर भी इस सर्वे से उत्तरप्रदेश की युवा पीढ़ी, विषेशकर नवयुवतियाँ क्या सोचती हैं, इसकी कुछ जानकारी मिलती है.

आप बताईये कि आप के अनुभव इस सर्वे में पायी जाने वाली स्थिति से कितने मिलते हैं और कितने भिन्न हैं? और अगर आप को इस तरह के प्रश्न पूछने का मौका मिलता तो बदलते उत्तरप्रदेश को समझने के लिए आप कौन से प्रश्न पूछते?

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सोमवार, मार्च 30, 2015

भारत की बेटियाँ

पिछले कई दिनों से बीबीसी की डाकूमैंटरी फ़िल्म "इंडियाज़ डाटर" (India's daughter) के बैन करने के बारे में बहस हो रही थी. आजकल कुछ भी बहस हो उसके बारे में उसके विभिन्न पहलुओं का विषलेशण करना, अन्य शोर में सुनाई नहीं देता. शोर होता है कि या तो आप इधर के हैं या उधर के हैं. अगर आप प्रतिबन्ध लगाने के समर्थक हैं तो रूढ़िवादी, प्रतिबन्ध के विरोधी है तो उदारवादी, या फ़िर इसका उल्टा.

किसी बात के क्या विभिन्न पहलू हो सकते हैं, किस बात का समर्थन हो सकता है, किसका नहीं, जैसी जटिलताओं के लिए इन बहसों में जगह नहीं होती.

कुछ लोग कह रहे थे कि यह डाकूमैंटरी पश्चिमी देशों की चाल है, भारत को नीचा दिखाने की. एक बेलजियन प्रोफेसर जेकब दे रूवर ने एक आलेख में लिखा कि भिन्न यूरोपीय देशों में अधिक बलात्कार होते हैं, उनके मुकाबले में भारत में कम होते हैं. इसलिए वह भी सोचती है कि इस तरह की डाकूमैंटरी बनाना उस यूरोपीय सोच का प्रमाण है जो भारत जैसे विकसित देशों को असभ्य और पिछड़ा हुआ मानती है तथा इस तरह के समाचारों को बढ़ा चढ़ा कर दिखाती है.

Rapes in India graphic by Sunil Deepak

तो क्या सचमुच भारत एक बलात्कारी देश है‌ ?

मेरे विचार में दंगों जैसी स्थितियों को छोड़ दिया जाये तो बलात्कारों के विषय में भारत की स्थिति अन्य देशों की तरह है, उनसे न बहुत कम न बहुत अधिक. इसलिए अगर आँकणों के हिसाब से भारत में बलात्कार कम होते हैं तो इसकी वजह यह नहीं कि हमारे पुरुष कम बलात्कारी हैं, इसकी वजह है कि गरीबों, शोषितों और औरतों के साथ होने वाले अपराधों के बारे में हमारे आँकणे अधूरे रहते हैं. हमारे यहाँ पुलिस के पास जाना अक्सर अपराध का समाधान नहीं करता, बल्कि उस पर अन्य तकलीफ़ें बढ़ा देता है. सामान्य जन के लिए, कुछ अपवाद छोड़ कर, पुलिस का नाम न्याय या सहायता से नहीं जुड़ा, बल्कि अत्याचार, उसका ताकतवरों का साथ देना व दुख से पीड़ित लगों से घूसखोरी की माँगें करना, जैसी बातों से जुड़ा है.

बलात्कार जैसी बात हो तो उसकी शिकार औरतों के प्रति समाजिक क्रूरता को सभी जानते हैं.  जैसी हमारी सामाजिक सोच है, हमारी पुलिस की भी वही सोच है. यानि बलात्कार हुआ हो तो इसका कारण उस युवती के चरित्र, काम, पौशाक में खोजो. तो अचरज क्यों कि हमारे बलात्कारों के आँकणे विकसित देशों के सामने कम है ?

विदेशों में भारत की बलात्कारी छवि

यह सच है कि यूरोप में वहाँ प्रतिदिन होने वाले बलात्कारों के समाचारों को इतनी जगह नहीं मिलती जितनी भारत से आने वाले इस तरह के समाचारों को मिलती है. इससे पिछले दो वर्षों में विदेशों में भारत की बलात्कार समस्या को बहुत प्रमुखता मिली है. पर इसके कई कारण हैं. हर देश, हर गुट के बारे में कुछ प्रचलित छवियाँ होती हैं. इन्हें स्टिरियोटाइप भी कहते हैं. इन स्टिरियोटाइप छवियों का फायदा है कि कुछ भी बात हो उसे लोग तुरंत समझ जाते हैं, कुछ समझाने की आवश्यकता नहीं पड़ती. विदेशों में भारत की स्टिरियोटाइप छवि है जिसमें गाँधी जी, शाकाहारी होना, अहिँसा, ताज महल, आध्यात्म, ध्यान, योग, जैसी बातें जुड़ी हैं, जिन्हें हम सामान्यतह सकारात्मक मानते हैं. इसी स्टिरियोटाइप छवि के कुछ नकारात्मक पहलू भी हैं जैसे कि भारत की छवि गरीबी, गन्दगी, बीमारियाँ, जातिप्रथा जैसी बातों से भी जुड़ी है.

यह स्टिरियोटाइप छवियाँ स्थिर नहीं होती, इसमें नयी बातें जुड़ती रहती है, पुरानी बातें धीरे धीरे लुप्त हो जाती है. पहले भारत की छवि थी सपेरों और जादूगरों की. आज दुनिया में भारत को सपेरों का देश देखने वाले लोग कम हैं, जबकि कम्पयूटर तकनीकी, गणित में अव्वल स्थान पाने वाले या अंग्रेज़ी में अच्छा लिखने वाले लेखकों की बातें इस छवि से जुड़ गयी हैं.

भारत की प्रचलित छवियाँ औरतों के बारे में कुछ सकारत्मक है, कुछ नकारात्मक. एक ओर गरिमामय, सुन्दर, साड़ी पहनी युवतियों की छवियाँ हैं, हर क्षेत्र में अपनी धाक जमाने वाली औरतों की छवियाँ हैं, तो दूसरी ओर दहेजप्रथा, सामाजिक शोषण, भ्रूणहत्या से जुड़ी बातें भी हैं. उन्हीं नकारात्मक बातों में पिछले कुछ वर्षों में बलात्कार भी बात जुड़ गयी है.

यह छवियाँ सकारात्मक हों या नकारात्मक, स्टिरियोटाइप से लड़ना तथा उन्हें बदलना आसान नहीं. बल्कि खतरा है कि उनके विरुद्ध जितना लड़ोगे, वह उतना ही अधिक मज़बूत जायेंगी. मुझे नहीं मालूम कि इस तरह की स्टिरियोटाइप छवियों के बनने को किस तरह से रोका या कम किया जा सकता है. इससे भारत को अवश्य नुकसान होता है. कितने ही मेरे यूरोपीय मित्र, विषेशकर, महिला मित्र, जो पहले यहाँ नहीं आये और जिन्हें भारत के व्यक्तिगत अनुभव नहीं हैं, भारत आने का सोच कर डरते हैं.

क्या भारत में दिल्ली में हुए निर्भया के बलात्कार से पहले ऐसी घटनाएँ नहीं होती थीं? होती थीं लेकिन राजधानी में जनसाधारण, विषेशकर युवाओं का इस तरह बड़ी संख्या में विरोध में निकल कर आना शायद पहली बार हुआ. टेलिविज़न पर समाचार चैनलों की बढ़ोती तथा उनमें आपस में दर्शक बढ़ाने की स्पर्धा ने उस विरोध को समाचार पत्रों में व चैनलों पर प्रमुख जगह दी. इस समाचार को और उस बलात्कार की बर्बता ने सारी दुनिया में समाचारों में जगह पायी.

यूरोप में भारत के बारे में समाचार अक्सर तभी दिखते हैं जब किसी दुर्घटना में बहुत लोग मर जाते हैं. यह हर देश में होता है, आप सोचिये कि क्या भारत में टीवी समाचारों में यूरोप के बारे में किस तरह के समाचार दिखाये जाते हैं? लेकिन जब निर्भया काँड के बाद भारत के युवा सड़कों पर निकल आये थे, इसके समाचारों को यूरोप के टीवी समाचारों में बहुत दिनों तक प्रमुखता मिली थी.

उस घटना के बाद से, दिल्ली या मुम्बई जैसे शहरों में जब भी मध्यम या उच्च वर्ग की युवती के साथ बलात्कार होता है तो हमारे टीवी समाचार चैनल हल्ला कर देते हैं. ब्रेकिन्ग न्यूज़ बन कर सारा दिन उसकी बात होती है, शाम को हर चैनल उसी पर बहस करती है. अगर बलात्कार विषेश बर्बर हो या भारत की पहले से प्रचलित नकारात्मक छवि से जुड़ा हो, जैसे कि जातिभेद या महिलाओं को शोषण से, तो उसे विदेशों में भी समाचारों में जगह मिलती है. जब हमारे राजनेता बलात्कार के बारे में कुछ वाहियात सी बात करते हैं तो उसे भी विदेशी समाचारों में भरपूर जगह मिलती है. मसलन, जब मुलायम सिंह यादव ने कहा कि "लड़कों से गलती हो जाती है" तो बहुत से यूरोपीय समाचार पत्रों ने उसका समाचार पहले पृष्ठ पर दिया था.

भारतीय समाचार पत्रों तथा चैनलों का भाग

कुछ सप्ताह पहले जब एक सुबह कोलकता से निकलने वाले अंगरेज़ी अखबार टेलीग्राफ़ में मुख्य पृष्ठ पर दिल्ली बलात्कार काँड के बस ड्राइवर मुकेश सिंह का साक्षात्कार छपा देखा था तो बहुत हैरानी हुई थी. सोचा था कि क्यों अखबार वालों ने इस तरह की व्यक्ति की इन वाहियात बातों को इस तरह से बढ़ा चढ़ा कर कहने का मुख्य पृष्ठ पर मौका देने का निर्णय लिया ? मुझे लगा कि इस तरह की सोच वाले लोग भारत में कम नहीं और उस साक्षात्कार को इस तरह प्रमुखता पाते देख कर, उन्हें यह लगेगा कि उनकी यह सोच शर्म की नहीं, गर्व की बात है. मैंने उस समय सोचा था कि बिक्री बढ़ाने के लिए समाचार वाले कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं.

मेरा विचार था कि यह आलेख समाचार पत्र में नहीं छपना चाहिये था. मेरे एक मित्र बोले कि न छापना तो मानव अभिव्यक्ति अधिकार के विरुद्ध होगा. मेरा कहना था कि जब कोई अगर अन्य लोगों के प्रति हिंसा करने, बलात्कार करने, जान से मारने की बात की बात करे तो वह मानव अभिव्यक्ति अधिकार नहीं हो सकता क्योंकि उससे अन्य लोगों के जीवन व सुरक्षा के अधिकारों पर हमला होता है.

यह कुछ दिन बाद समझ में आया कि वह "समाचार" नहीं था, एक डाकूमैंटरी से लिया गया हिस्सा था जिसे डाकूमैंटरी का परिपेक्ष्य समझाये बिना ही समाचार पत्र में छापा गया था. डाकूमैंटरी के बारे में जहाँ तक पढ़ा है, मुकेश सिंह का साक्षात्कार उसका छोटा सा हिस्सा है, उसमें अन्य भी बहुत सी बाते हैं. उसे देखने वालों ने कहा है कि यह फ़िल्म बलात्कारी सोच के विरुद्ध उठायी आवाज़ है. अगर डाकूमैंटरी में यह सब कुछ है तो क्यों समाचार पत्रों ने मुकेश सिंह के साक्षात्कार को इस तरह से बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत किया जिससे यह लगे कि यह आम भारतीय पुरुषों की सोच है? यानि जनसाधारण में इस फ़िल्म के प्रति प्रारम्भिक उत्तेजना बढ़ाने में समाचार पत्रों तथा टेलिविज़न चैनलों ने क्या हिस्सा निभाया ?

क्या समाचार पत्रों ने मुकेश सिंह के कथन को इतनी प्रमुखता दी थी या फ़िर डाकूमैंटरी बनाने वालों ने अपनी प्रेस रिलीज़ में मुकेश सिंह वाले हिस्से को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत किया था ?

निर्भया के बलात्कार के बाद, भारत में बलात्कार होने कम नहीं हुए हैं. लेकिन शायद बढ़े भी नहीं हैं, केवल इन समाचारों का छुपना कम हो गया है ? प्रतिदिन हर शहर में बलात्कार होते हैं, जैसे पहले भी होते थे. पर अब समाचार चैनलों में बलात्कारों को जगह मिलने लगी है. पर शायद यह भी सोचना चाहिये कि किस तरह की जगह मिल रही है, इस तरह के समाचारों को?

पिछले वर्ष जुलाई में कुछ सप्ताह के लिए लखनऊ में था, एक स्थानीय चैनल पर आधे घँटे के समाचारों में बीस-पच्चीस मिनट तक  यहाँ बलात्कार, वहाँ बलात्कार की बात होती रही. मुझे थोड़ा अचरज हुआ कि उस समाचार बुलेटिन में इतनी जगह इस तरह के समाचारों को मिली, जैसे कि 20 करोड़ की जनसंख्या वाले उत्तरप्रदेश में अन्य अपराध या अन्य समाचार नहीं हों ? क्या यही तरीका है इस बात के बारे में जनचेतना जगाने का या जनता को जानकारी देने का ?

असली बात

लेकिन क्या यही बात सबसे महत्वपूर्ण है कि विदेशों में हमारे बारे में क्या सोचते हैं? कोई अन्य क्या सोचता है, यह तो बाद की बात है, पहली बात है कि हम इस बारे में स्वयं क्या सोचते है? उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है यह सोचना कि जिन अपराधों के बारे में हम बात कर रहे हैं क्या उनसे पीड़ित लोगों को न्याय मिल रहा है या नहीं, समाज की विचारधारा बदल रही है या नहीं.

सच तो यह है कि हमारे देश में आज भी हर दिन हज़ारों भ्रूणहत्याएँ होती हैं, लड़कियों से, "छोटी" जाति के लोगों से, गरीबों के साथ जब अपराध होते हैं तो कितने समाचार पत्र उन्हें छापते हैं? उनमें से कितनों की रपट पुलिस में लिखी जाती है? उनके बारे में टीवी पर कौन बात करता है? क्या इस सब के बारे में हमारे देश में सन्नाटा नहीं रहता? भारत के छोटे बड़े शहरों में लड़कियों व औरतों जब बाहर जाती है तो सड़कों पर, बसों में, काम की जगहों पर, "छेड़खानी" आम बात हैं और लोग चुपचाप देखते हैं.

हमारी पुलिस तथा न्याय व्यवस्था दोनों में कितनी सड़न है. इस स्थिति में मुकेश सिंह व उनके वकीलों की बलात्कारी सोच अपवाद नहीं, सामान्यता है. क्या हमारे राजनेता, धर्मगुरु, क्या यही नहीं कहते कि लड़कियों को रात को काम नहीं करना चाहिये, जीन्स नहीं पहननी चाहिये, आदि ? यानि उनकी सोच है कि इस सब की वजह से उनका बलात्कार हुआ. यानि गलती उन्हीं की है, समाधान भी उन्हें ही करना है. हमारे युवाओं तथा पुरुषों की सोच बदलने की बात नहीं होती. उनकी सोच मुकेश सिंह की सोच से अधिक भिन्न नहीं. शायद इसीलिए उस डाकूमैंटरी की बात हमें इतनी बुरी लगी क्योंकि उसमें हमारी सोच का सच है ?

कल टाईमस ऑफ़ इन्डिया के विनीत जैन के बारे में पढ़ा कि उन्होंने कहा हम समाचार पत्रों के धँधे में नहीं, विज्ञापन बेचने के धँधे में हैं. यानि समाचार पत्रों को बिक्री का सोचना है, नीति, या समाज का नहीं.

क्या हमारी टीवी चैनल भी टीआरपी के चक्कर में चिल्लाने वाली बहसों, हर बात को ब्राकिन्ग न्यूज़ बनाना, स्केन्डल बनाना जैसी बातों में नहीं व्यस्त रहतीं ? और समाचार पत्रों या चैनलों को दोष देना आसान है पर लाखों करोड़ों लोग उन्हीं चैनलों को देख कर चटकारे लेते हैं. जहाँ गम्भीरता से बात हो रही हो, तथा जटिल समस्याओं के समाधान सोचे खोजे जायें, तो उन्हें कितने लोग देखते हैं ?

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शनिवार, फ़रवरी 22, 2014

हमारे शरीर, सामाजिक विद्रोह व कलात्मक अभिव्यक्ति

सदियों से पैसे वाले व ताकतवर लोग अपनी तस्वीरें बनवाते आये हैं. पिछली सदी में फोटोग्राफ़ी के विस्तार से हर कोई अपनी तस्वीरें खिचवाने लगा. पिछले दशक में डिजिटल कैमरों के प्रचार से और फेसबुक, टिविटर जैसी वेबसाइट के वजह से तस्वीर खीचना और उस पर बातें करना इतना फैला है कि कुछ लोग मानते हैं कि यह सदी शब्दों की नहीं तस्वीरों की सदी कहलायेगी और इससे मानव सभ्यता में बड़ा बदलाव आयेगा. इन सब की वजह से लोगों का अपनी असहमती दिखाना, विद्रोह प्रदर्शित करना या अपनी बात को कलात्मक तरीकों से अभिव्यक्त करना, इस सब में भी नये प्रयोग हो रहे हैं.

शायद फेमेन (Femen) की विद्रोही युवतियों के बारे में आप ने सुना होगा जो कि अपने वस्त्रहीन शरीर के माध्यम से अपनी बात कहती हैं?

फेमेन का नारा है "मेरा शरीर, मेरा घोषणापत्र". फेमेन में हिस्सा लेने वाली युवतियाँ कहती हैं कि वे लोग नारी का यौनिक शोषण, तानाशाही व धर्म के माध्यम से नारी शरीर पर अधिपत्य कायम करने के विरुद्ध हैं. अक्सर फेमेन की युवतियों पर विभिन्न देशों की सरकार व पुलिस बहुत सख्ती से पेश आती हैं, शायद क्योंकि उनके इस वस्त्रहीन विद्रोह में पृतसत्ता पर आधारित समाज की नींव हिलाने वाली बात है जोकि नारी शरीर को नैतिकता से ढकने पर टिका है.

नारी का शरीर ढकना, लज्जा करना, कौमार्य बचाना आदि को विभिन्न समाजों ने इतना महत्वपूर्ण माना है कि उसे धार्मिक ग्रंथों की सहायता से भगवान के दिये आदेशों की मान्यता दी है. बचपन से ही कन्याओं को यह सिखाया जाता है कि यही नारी का जन्मजात स्वभाव है, और पुरुषों को सीख दी जाती है कि माँ, पत्नी व बहनों के इस लक्ष्मणरेखा में बाँध कर रखने में उनकी व उनके पूर्वजों की इज्जत व आत्मसम्मान निहित हैं.

फेमेन का जन्म यूक्रेन में 2008 में हुआ और जल्दी ही पूर्वी व पश्चिमी यूरोप से होता हुआ उत्तरी अफ्रीका व मध्यपूर्व के देशों तक फ़ैल गया. कुछ समय पहले, मिस्र की आलिया अलमाहदी ने जब फेसबुक के माध्यम से अपनी वस्त्रहीन तस्वीर लगा कर अपने परिवार व समाज के प्रति अपना विद्रोह अभिव्यक्त किया तो कुछ लोगों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी और उन्हें मिस्र छोड़ कर स्वीडन में शरण लेनी पड़ी. लेकिन आलिया ने देशनिकाला ले कर भी अपना विद्रोह नहीं छोड़ा, स्वीडन में मिस्री दूतावास के सामने उन्होंने वस्त्रहीन हो कर, हाथ में कुरान को ले कर अपना विद्रोह जताया (आलिया का वीडियो). इससे उनकी जान लेने वाले और बढ़ गये हैं और उन्हें कुछ कुछ दिनो में घर बदल कर, भेष बदल कर रहना पड़ रहा है.

दूसरी ओर शारीरिक नग्नता को कला के माध्यम से सामाजिक संदेश पहुँचाने का माध्यम भी बनाया गया है. अमरीकी फोटोग्राफर स्पैन्सर ट्यूनिक अपनी अमूर्त कला तस्वीरों के लिए बड़ी संख्या में लोगों की वस्त्रहीन तस्वीर खींचने के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं, उनके बारे में मैंने कई वर्ष पहले लिखा था.

मैं अपने शरीर के माध्यम से दुनिया को संदेश देने वाले लोगों के साहस की दाद देता हूँ. इसलिए जब मेरे ब्राज़ीली मित्र मारसेलो ने मुझसे पूछा कि क्या मैं उसके "शरीर के माध्यम से संदेश देने" के फोटोप्रोजेक्ट में हिस्सा लेना चाहुँगा तो मैंने तुरंत हाँ कर दी. मारसेलो के इस फोटोप्रोजेक्ट का नाम है "आ फ्लोर दा पेले" यानि "त्वचा के फ़ूल".

मारसेलो ने एडस् रोग से पीड़ित बच्चों के साथ काम किया है और वह इस फोटोप्रोजेक्ट से सामाजिक व पर्यावरण सरंक्षण का संदेश देना चाहते हैं. उनकी तस्वीरों में शरीर का कमर से ऊपर का हिस्सा वस्त्रहीन होता है जिसपर रंगों से चित्र बनाये जाते हैं. अप्रैल के महीने में मारसेलो इटली आयेगा तो इसके लिए मेरी भी तस्वीर खिंचेगी. आधे धड़ की तस्वीर खिंचवाने में कोई साहस नहीं चाहिये, इसलिए मैं चितित भी नहीं हूँ!

मैं सोच रहा हूँ कि मारसेलो की तस्वीर के लिए शरीर पर कौन सा डिजाइन बनवाना चाहिये? कुछ ऐसा होना चाहिये जिसमें भारत भी हो और प्रकृति व पर्यावरण की बात भी हो. अगर आप के पास कोई सुझाव हों तो अवश्य बताईयेगा.

जब मारसेलो मेंरी तस्वीर खीचेगा तो उसके बारे में आपको बताऊँगा. लेकिन मैं पहले भी कुछ फोटोप्रोजेक्ट में हिस्सा ले चुका हूँ जिनकी कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं:

(1) पहली तस्वीर मेरा कार्टून है जो मारसेलो ने सन 1997-98 के आसपास एक ब्राज़ील यात्रा के दौरान बनाया था.

Sunil Deepak by Marcelo Mendonça

(2) दूसरी तस्वीर वह है जो कुष्ठ रोग दिवस के अवसर पर एक इतालवी पोस्टर के लिए 2003 में खींची गयी थी. इस पोस्टर से कुछ दिनों के लिए मुझे कुछ प्रसिद्ध मिली थी, क्योंकि यह तस्वीर बहुत सी पत्रिकाओं में छपी थी. जहाँ जाता कुछ लोग पहचान जाते , उँगली उठा कर मेरी ओर इशारा करते.

Sunil Deepak for world leprosy day campaign 2003

(3) तीसरी तस्वीर है सन् 2011 से जब मैंने इतालवी कलाकार विर्जिनया फरीना के मृत्यू के बारे में विभिन्न संस्कृतियों में क्या विचार हैं जो कि इस विषय पर आधारित फोटोप्रोजेक्ट के लिए खिचवायी थी. इस तस्वीर को खींचने के लिए उन्होंने अँधेरे कमरे में एक टोर्च व एक गोल नली का उपयोग किया था जिससे वह मृत्यू का आभास देना चाहती थीं.

Sunil Deepak by Virginia farina

इस प्रोजेक्ट की प्रदर्शनी बोलोनिया शहर के कब्रिस्तान में सात सौ वर्ष पुरानी कब्रों के कक्ष में लगी थी. मुझे कई लोगो ने कहा था कि इसमें हिस्सा न लो, जीते जी मरने की तस्वीर खिंचवाना ठीक नहीं होगा. पर मुझे इस फोटोप्रोजेक्ट में हिस्सा लेना बहुत अच्छा लगा था.

Exhibition of Virginia farina at Certosa cemetery of Bologna

(4) चौथी तस्वीर है पिछले वर्ष से जब लाउरा फ्रास्का व लाउरा बासेगा नाम की दो युवतियों ने इटली में रहने वाले विभिन्न देशों के प्रवासियों के बारे में फोटोप्रदर्शनी बनायी थी. इसमें मुझे एक किताब की दुकान में बैठ कर किताब पढ़ते हुए दिखाया गया था.

Sunil Deepak by Laura Frasca & Laura Bassega

(5) यह अंतिम तस्वीर है इसी वर्ष यानि 2014 की. विकलाँग व्यक्तियों के मानव अधिकारों के बारे में चित्रकथा की किताब में मैं भी एक पात्र हूँ. इसको बनाने वाले कलाकार का नाम है कनजानो.

Sunil Deepak by Kanjano

मेरे विचार में एक विषय को ले कर तस्वीरें खीचने का प्रोजेक्ट बनाना कला की नयी विधि है जिससे सामाजिक संचेतना लाना कुछ आसान हो जाता है क्योंकि जितने अधिक लोग इसमें हिस्सा लेते हैं, उनमें से हर कोई फेसबुक, टिविटर, ब्लाग, आदि के माध्यम से अपने परिवार, मित्रों आदि में इसका विज्ञापन करता है और अधिक लोगों को इसके बारे में जानकारी मिलती है.

जिस तरह से मारसेलो ने अपना प्रोजेक्ट बनाया है, उसमें सभी तस्वीरें ब्लाग पर लगायी जा रही हैं इसलिए प्रदर्शनी लगाने का खर्चा नहीं है और यह प्रोजेक्ट वह धीरे धीरे कई सालों तक बना सकते हैं.

मुझे आशा है कि आप को इनसे अपना कोई फोटोप्रोजेक्ट बनाने की प्रेरणा मिलेगी! अगर   ऐसा हो तो मुझे इस बारे में अवश्य बताईयेगा.

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शुक्रवार, जुलाई 05, 2013

यह कैसी पत्रकारिता?

पिछले दो दशकों में भारत में टीवी चैनलों और इंटरनेट के माध्यम से पत्रकारिता के नये रास्ते खुले हैं. शायद पत्रकारिता के इतने सारे रास्ते होने के कारण ही पिछले कुछ सालों में किसी भी बात को बढ़ा चढ़ा कर उसे "ब्रेकिन्ग न्यूज़", कुछ जाने माने नाम हों उनके आसपास स्केन्डल बनाना और बातों को बिल्कुल न समझ कर या सतही तौर से समझ कर उन पर लिखना बढ़ता जा रहा है. यह सच है कि आज की दुनिया में पैसा कमाना ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है पर क्या मीडिया में किसी बात को ठीक से बताने समझाने की बिल्कुल कोई जगह नहीं है?

यह बातें मेरे मन में आयीं जब मैंने शाहरुख खान के बच्चे के पैदा होने से पहले उसके "सेक्स जानने के टेस्ट" कराने के "स्केन्डल" के बारे में पढ़ा. इस पर कुछ दिनों से लगातार समाचार छप रहे हैं और मुम्बई की रेडियोलोजिस्ट एसोसियेशन ने इस बात पर शाहरुख पर मुकदमा दायर किया है. क्या आप ने इस विषय पर एक भी समाचार या रिपोर्ट देखी जो बात को ठीक से समझने की कोशिश करे?

बच्चे का सेक्स टेस्ट कैसे होता है?

पहली बात जिसे समझने की आवश्यकता है वह है कि होने वाले बच्चे के सेक्स जानने का टेस्ट क्या होता है? यह टेस्ट कैसे किया जाता है? होने वाले बच्चे के लिँग को जानने का सबसे आसान तरीका है अल्ट्रासाउन्ड (Ultrasound) का टेस्ट. लेकिन क्या कानून कहता है कि अल्ट्रासाउन्ड न किया जाये?

अल्ट्रासाउन्ड एक तरह का एक्सरे होता है जिसमें ध्वनि की लहरों का प्रयोग किया जाता है और जिससे शरीर के भीतर के अंगों को देखा जा सकता है. गर्भवति औरतों की समय समय पर अल्ट्रासाउन्ड टेस्ट से जाँच की जाती है जिससे अगर माँ के गर्भ में पल रहे बच्चा ठीक से पनप रहा है, उसे कुछ तकलीफ़ तो नहीं, यह सब देखा जा सकता है. जब अल्ट्रासाउन्ड से बच्चे को देखते हैं तो उसके यौन अंगो के विकास से, आप यह भी देख सकते हैं कि होने वाला बच्चा लड़की होगी या लड़का.

कानून ने अल्ट्रासाउन्ड टेस्ट को मना नहीं किया है, क्योंकि यह टेस्ट करना माँ और होने वाले बच्चे की सेहत की रक्षा के लिए अमूल्य है. कानून ने केवल यह कहा है कि अल्ट्रासाउन्ड का टेस्ट करने वाले डाक्टरों को बच्चे के परिवार वालों को यह नहीं बताना चाहिये कि बच्चा लड़का है या लड़की. यह कानून इस लिए बनाया गया क्योंकि भारत में लड़कियों के भ्रूण गिराने की बीमारी हर प्रदेश, और समाज के हर स्तर के लोगों के बीच बुरी तरह से फ़ैली है और बढ़ती जा रही है.

सेक्स जाँच के टेस्ट

हर वर्ष भारत में लाखों लड़कियों की भ्रूण हत्या होती है और इसका सबसे बड़ा कारण भारत की सामाजिक सोच है. कानून के मना करने के बावज़ूद यह होता है क्योंकि परिवार वाले अधिक पैसा दे कर भी यह जानना चाहते हैं. टेस्ट करने वाले डाक्टर, चाहे वे पुरुष हों या नारी डाक्टर, परिवार को यह बात बताते हैं, और कानून तोड़ते हैं. कुछ इसलिए कि वह इस बात को मानते हैं कि बेटी होना अभिशाप है और बेटी का गर्भ गिराना ही बेहतर है पर मेरे विचार में अधिकतर डाक्टर यह पैसे के लालच में करते हैं.

भारतीय कानून नारी को गर्भ गिराने की पूरी छूट देता है, इसलिए नारी रोग विषेशज्ञ डाक्टरों को यह पूछने का अधिकार नहीं कि कोई औरत क्यों गर्भपात कराना चाहती है. लेकिन अगर डाक्टर यह जानता हो कि कोई यह जान कर कि बेटी होगी, इसलिए गर्भपात कराना चाहता है तो उन्हें यह नहीं करना चाहुये बल्कि कानून को रिपोर्ट करनी चाहिये. पर प्राइवेट नर्सिन्ग होम या अस्पताल वाले अगर पैसे कमा सकते हों तो क्या आप की राय में वह गर्भपात करने से मना करेंगे?

यानि लड़कियों की भ्रूण हत्या के लिए बेटियों के प्रति हमारी सामाजिक सोच और हर स्तर पर पैसा कमाने का लालच ज़िम्मेदार हैं. शहरों के पढ़े लिखे लोगों में और पैसे वाले लोगों में यह सोच अधिक गहरी है. पिछले वर्ष आमिर खान के कार्यक्रम "सत्यमेव जयते" में इस विषय में दिखाया गया था.

शाहरुख खान का बच्चा

समाचारों मे पढ़ा कि उनका बेटा सर्रोगेट मातृत्व से पैदा हुआ है. सार्रोगेट मातृत्व का सहारा तब लेते हैं जब प्राकृतिक माँ को गर्भ को पूरा करने में कोई कठिनाई हो. इसके लिए लेबोरेटरी में बच्चे की माँ की ओवरी यानि अण्डकोष से अण्डे को लिया जाता है और पिता के वीर्य से मिलाया जाता है. इस तरह से प्राप्त भ्रूण को, जिस स्त्री ने मातृत्व पूरा करने का काम लिया हो, उसके गर्भ में स्थापित किया जाता है. लेबोरेटरी में अण्डे तथा वीर्य को मिलाने से बीमारी वाला बच्चा न पैदा हो, इसके लिए कई तरह के टेस्ट किये जाते हैं जिनसे बच्चे को गर्भ में स्थापित करने से पहले ही या मालूम हो सकता है कि लड़का होगा या लड़की.

अगर माता या पिता में कोई इस तरह की बीमारी हो जो बच्चे को हो सकती है तो, उन बीमारियों को पहचानने, रोकने और स्वस्थ्य बच्चा पैदा करने लिए भी सर्रोगेट मातृत्व का सहारा लिया जाता है.  इस तरह के बच्चों के लिए, भ्रूण लड़का है या लड़की, यह जानना आवश्यक हो जाता है. भारतीय कानून इस बात की भी अनुमति देता है. भारतीय कानून का ध्येय है छोटे बड़े शहरों में अल्ट्रासाउन्ड क्लिनिकों का गलत उपयोग करने से रोकना ताकि लड़कियों की भ्रूण हत्या न हो.

इसलिए मेरे विचार में अगर शाहरुख खान को यह जानना ही था कि उनका होने वाला बच्चा बेटा होगा या बेटी तो उन्हें अल्ट्रासाउन्ड की आवश्यकता नहीं थी, इसलिए उन्होंने कानून नहीं तोड़ा. पर आप अपने दिल पर हाथ रखिये और कहिये कि यह हँगामा करने से पहले क्या मुम्बई की रेडियोलिजिस्ट एसोसियेशन ने और पत्रकारों ने यह सोचा कि यह कानून क्यों बनाया गया? और क्या सचमुच शाहरुख खान की बेटी होती तो वह बच्चे का गर्भपात कराते, क्या यह सोच कर इन लोगों ने सारा हँगामा किया है?

दिखावे के पीछे की सड़न

सच तो यह है कि हमारे देश के क्लिनिकों और अस्पतालों में हर दिन हज़ारों अल्ट्रासाउन्ड होते हैं, और लड़कियों के भ्रूण गिराये जाते हैं, पर कोई उन पर मुकदमें नहीं करता. मुम्बई की या देश की अन्य रेडियोलिस्ट एसोसियेशनो ने कितने डाक्टरों को इस कानून को तोड़ने के लिए एसियेशन से बाहर निकाला है या उन पर मुकदमा किया है? कितने पत्रकारों ने इस बात को ठीक से समझने की कोशिश की है और उस पर रिपोर्ट लिखी हैं कि भारत के कौन से क्लिनिक इस धँधे में लगे हैं?

यह सब तमाशा है, खबर बनाने का, चटखारे ले कर जाने माने लोगों के माँस को नोचने का, क्योंकि जितना मशहूर नाम होगा खबर उतनी ही बड़ी होगी, उतने अधिक पैसे बनेंगे. "सत्यमेव जयते" में दिखाया गया था कि जिन डाक्टरों को इसके बारे में कहते और करते हुए वीडियो पर तस्वीर ले ली गयी थी, वे भी बेधड़क धँधे में जारी थे, क्या प्रोग्राम के बाद उनके विरुद्ध कुछ हुआ?

अगर 2011 तथा 2001 में हुई जनगणना से मिली जानकारी देखें तो इन दस सालों में भारत के बहुत से राज्यों में लड़कियों की भ्रूण हत्या में कुछ कमी आयी है लेकिन सब कुछ मिला कर देखें तो राष्ट्रीय स्तर पर पैदा होने वाली लड़कियों की संख्या और कम हुई है.

2011 की जनगणना के अनुसार हर एक हजार पैदा होने वाले लड़कों के मुकाबले में लड़कियाँ 914 थीं. यानि करीब 8 प्रतिशत लड़कियाँ कम थीं.

केवल गर्भ में नहीं मरती लड़कियाँ, किसी भी बात में देखिये, चाहे स्वास्थ्य हो या शिक्षा, हर बात में लड़कियाँ लड़कों से पीछे हैं, बस मरने में ही उनका नम्बर सबसे आगे हैं. पर यह सब तो हमेशा होते ही रहते हैं, इससे क्या समाचार बनेगा? समाचार तो शाहरुख के नाम से बनता है. समाचारों की नैतिकता की बात करने का किसके पास समय है?

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सोमवार, मई 27, 2013

मिथकों में जीवन

बात कहीं से शुरु होती है और फ़िर किसी अन्य दिशा से कोई तार उससे आ मिलते हैं, और बातों में बातें जुड़ जाती हैं.

Mithak - Myths
कुछ यूँ ही हुआ जब मैंने अपने फोटो ब्लाग "छायाचित्रकार" पर तीन महाद्वीपों से विभिन्न तरह की गिलहरियों की तस्वीरें लगाने की सोची. दिल्ली में कुतुब मीनार के पास खींची गिलहरी की तस्वीर देख रहा था तो उसकी पीठ पर कथई रंग की धारियों से याद आया कि उसके बारे में बचपन में कहानी सुनी थी. उस कथा के अनुसार, जब राम अपनी सैना को ले कर लँका जाने के लिए सागर पर पुल बना रहे थे तो गिलहरी ने पत्थर लाने में बहुत मेहनत की और गिलहरी को धन्यवाद देने के लिए उन्होंने जब उसकी पीठ को सराहा तो उनकी उँगलियों के निशान उसकी पीठ पर रह गये.

फ़िर सोचा कि मानव ने क्यों इस तरह के मिथक रचे? मिथकों का जीवन में क्या लाभ है?

केवल भारत में नहीं, हर देश, हर संस्कति ने पूर्वेतिहासिक काल में अपने मिथक रचे, तो मानव समाज में अवश्य उनका कुछ महत्व और उपयोग होता था, जिसकी वजह से सभी सभ्यताओं में मिथक रचे गये. अक्सर सभ्यताओं से जुड़े मिथक, उन सभ्यताओं के प्रचलित धर्मों से जुड़ जाते हैं, जिसकी वजह से अंग्रेज़ी में धार्मिक कथाओं को माइथोलोजी (mythology) कहते हैं, यानि "मिथकों की कहानियाँ".

यह सोच रहा था तो जानी मानी भारतीय विचारक, पारम्परिक जनजातियों के ज्ञान की रक्षा की पक्षधर और भूमण्डलीकरण की विरोधी सुश्री वन्दना शिव की एक बात याद आयी. वन्दना मेरी मित्र डा. मीरा शिव की बहन हैं. कुछ वर्ष पहले वह इटली के फ्लोरैंस शहर में एक समारोह में आमन्त्रित थीं. मीरा ने उनके हाथ मेरे लिए कुछ सामान भेजा था, जिसके लिए मैं वन्दना से मिलने फ्लोरैंस गया था और उनका भाषण सुनने का मौका मिला. अपने भाषण में उन्होंने बात की थी, नयी तकनीकों से बीजों के डीएनए (DNA) को बदल कर नयी तरह की वनस्पतियों को बनाने के प्रयोगों से प्राकृति के संरक्षण की. उन्होंने कहा कि भारत में हिन्दू धर्म में तैंतीस करोड़ देवी देवता माने जाते हैं, और हर देवी देवता के साथ किसी न किसी पशु या पक्षी या वनस्पति का नाम भी जुड़ा होता है, जिनकी वजह से धर्म में विश्वास रखने वाले उन सब की रक्षा करते हैं. इस तरह से यह पौराणिक मिथक, मानव व प्राकृति के साथ साथ सामन्जस्य से रहने का संदेश देते हैं.

यानि, प्राचीन काल में जब विज्ञान नहीं था, किताबें नहीं थीं, तब मिथकों के द्वारा मानव जीवन के अनुभवों से अर्जित ज्ञान को याद रखा जाता था. इस तरह से देवी देवताओं की कहानियाँ एक माध्यम बन गयीं जिनसे मानव और प्राकृति में सामन्जस्य की आवश्यकता को नैतिक रूप दिया गया.

कुछ इसी तरह की बात एक बार मिस्र में एक मित्र ने मुसलमानों द्वारा सूअर के माँस को अपवित्र मानने के बारे में कही थी. वह कहते थे कि मध्य-पूर्व के देशों में सूअरों में सिस्टोसरकोसिस का रोग होता था और सूअर का माँस खाने से वह मानव शरीर में, विषेशकर दिमाग के तंतुओं में फैल जाता था. इसलिए सूअर के माँस की वर्जना की बात, वहाँ रहने वाली मानव जाति की सुरक्षा से जुड़ी थी.

मिथक क्यों बने, यह समझना हमेशा आसान नहीं होता. बहुत सी सभ्यताओं में नमक का गिरना या बिखरना अशुभ माना गया है. शायद इस मिथक के पीछे, पुराने समय में नमक को पाने की कठिनाई थी क्योंकि यह केवल सागर तटवर्ती क्षेत्रों में मिलता था. पर बहुत सी सभ्यताओं में काली बिल्ली को क्यों अशुभ माना गया, इसका कारण क्या हो सकता है?

जब लिखाई नहीं थी, किताबें नहीं थीं, तब इतिहास की महत्वपूर्ण बातों को न भूलने के लिए भी मिथक काम आते थे. जैसे कि अमरीकी जनजातियों के मिथकों में पृथ्वी पर मानव जीवन कैसे बना इसकी कहानियाँ हैं. इन मिथकों में आकाश से या चाँद से धरती तक एक पुल का बनना और उसे पार करके धरती पर आने की बातें हैं. इन कहानियों में कुछ इतिहासकारों ने करीब दस हज़ार वर्ष पहले के हिमयुग में उत्तरी सागर के बर्फ से जमने और उसे पार कर के एशियाई मूल के लोगों के अमरीका महाद्वीप पहुँचने की यात्रा के संकेत पाये हैं.

मिथक सामाजिक विचारों को भी शक्ति देते हैं. चाहे समाज में पुरुष के मुकाबले में नारी का नीचा स्थान हो या विकलाँग व्यक्तियों को समाज से बाहर देखने के प्रवृति, इनको प्राचीन मिथकों का सहारा मिलता है, जिनकी जड़ें समाज में बहुत गहरी होती हैं और जिन्हें बदलना आसान नहीं होता. दिल्ली में विकलाँग व्यक्तियों के मानव अधिकारों के क्षेत्र में कार्यरत मेरी मित्र डा. अनीता घई, रामायण में सूर्पनखा की कहानी का उदाहरण देती हैं कि सुन्दर सूर्पनखा स्वतंत्र हैं, उसकी यौनकिता भी स्वच्छंद है जोकि पितृसत्तावादी समाज में स्वीकार नहीं की जाती थी और इस अपराध के लिए उसकी नाक काट कर उसे विकलाँग बनाया जाता है, जिससे उसकी यौनकिता अस्वीकृत हो जाती है. इस तरह से मिथकों से जुड़े विचार, समाजिक रूढ़ीवाद का हिस्सा भी हो सकते हैं.

अपनी संस्कृति के मिथकों को जानना, हमें अपनी संस्कृति को गहराई से समझने का मौका देता है. भारतीय पारम्परिक मिथकों के बारे में डा. उषा पुरी विद्यावाचस्पति ने एक जानकारी से भरपूर किताब लिखी है, "भारतीय मिथकों में प्रतीकात्मकता" (सार्थक प्रकाशन, दिल्ली, 1997).  उदाहरण के लिए इसमें वह पूजा में उपयोग किये जाने वाली वस्तुओं तथा रीतियों के बारे में बताती हैं कि "ऊँ", शंख और स्वस्तिक में सृष्टि के आरम्भ का नाद है, जलयुक्त कलश को जल, वायू तथा सूर्य का प्रतीक मानते हैं, तथा कलश की गर्दन में बँधा कलावा मंगलमय आयोजन में समाज को स्नेहसूत्र में बाँधने का द्योतक है. रूद्राक्ष, शिव के आँसू या पसीने से बना है इसलिए मनुष्य को आधि व्याधि से मुक्त करता है. हल्दी में रोग निवारण शक्ति हैं और स्वर्ण का प्रतीक है, चावल दीर्घायुदायी हैं, जबकि दीपक प्रकाश तथा ज्ञान का प्रतीक है.

Cover of Bhartiya mithakon mein pratikatamkta by Dr Usha Puri Vidyavachaspati

यह बात नहीं कि मिथक केवल प्राचीन ही होते थे और आजकल नये मिथक नहीं बनते. पिछले वर्ष अमरीकी माया सभ्यता के कैंलेण्डर की भविष्यवाणी बता कर "20.12.2012 को दुनिया का अंत होगा" की बात को बहुत से लोगों ने सच मान लिया था. यानि आज "मिथक" का अर्थ धर्म से जुड़ी बातों से हट कर, झूठ या काल्पनिक बातों की तरह से होने लगा है. लोग फेसबुक और टिव्टर जैसे सोशल मीडिया की सहायता से नये मिथक बनाते हैं जो विभिन्न भाषाओं में अनुवादित हो कर एक देश या सभ्यता में सीमित नहीं रहते बल्कि सारी दुनिया में फ़ैलते हैं. इन नये मिथकों को "शहरी मिथक" भी कहते हैं जिनसे लोगों को डराते हैं. "अगर आप के पास इस तरह का ईमेल आये तो उसे नहीं खोलिये" या "अगर आप ने इस ईमेल को कम से कम दस लोगों को नहीं भेजा तो आप का विनष्ट होगा" या "इस ईमेल को दस लोगों को भेजेंगे तो लाटरी जीतेगें" जैसी बातें शहरी मिथक के दायरे में आती हैं. (नीचे की तस्वीर में "12 दिसम्बर को दुनिया का अंत होगा" के विषय पर बनी एक कलाकृति)

2012 Maya calendar myth sculpture by Joe Venturi and Matteo Varsellona

देखा आपने, एक गिलहरी की तस्वीर से शुरु हुआ विचार कहाँ तक पहुँच गया! मेरे विचार में प्राचीन मिथकों में छुपे प्राचीन ज्ञान को केवल अँधविश्वास कह कर भूल जाना या अस्वीकार करना गलती है. बहुत से मिथकों में सामाजिक बुराईयों के अँधविश्वास बने हैं, जो केवल मिथकों के शब्दिक अर्थ से जुड़े विचारों की कट्टरता का नतीजा हैं. पर जैसे वन्दना शिव के दिये उदाहरण से स्पष्ट होता है, इनमें छिपे सभी ज्ञान अवैज्ञानिक नहीं है. चाहे हम मिथकों में छुपे ज्ञान को संजोने की सोचे या उनसे जुड़ी गलत सामाजिक परम्पराओं को बदलने की बदलने की कोशिश करें, उनके महत्व को नहीं नकार सकते. आधुनिक मिथकों को गम्भीरता से नहीं लेना चाहिये, पर अपनी सोच समझ से उनके सच और झूठ को परखना चाहिये.

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मंगलवार, फ़रवरी 12, 2013

मानव और पशु

सुबह बाग में अपने कुत्ते के साथ सैर कर रहा था तो अचानक दूर से कुछ कुत्तों के भौंकने और लोगों के चिल्लाने की आवाज़ सुनायी दी. आगे बढ़ने पर दो आदमी ऊँची आवाज़ में बहस करते दिखे, दोनो के हाथ में उनके कुत्तों की लगाम थी जिसे वह ज़ोर से खींच कर पकड़े थे. दोनो कुत्ते बड़े बुलडाग जैसे थे, और एक दूसरे की ओर खूँखार दाँत निकाल कर गुर्रा रहे थे. हमारा कुत्ता छोटा सा है और बहुत बूढ़ा भी. डर के मारे मैं वापस मुड़ गया, यह सोच कर कि दूसरी ओर सैर करना बेहतर होगा.

मुझे वापस आता देख कर एक सज्जन जिनसे अक्सर बाग में दुआ सलाम होता रहता है और जिनकी छोटी कुत्तिया हमारे कुत्ते से भी छोटी है, मुस्करा कर बोले, "कुत्ते में टेस्टोस्टिरोन का हारमोन होता है, उससे वह अपने आप पर काबू नहीं रख पाते. कुत्तिया देखते हैं तो उस पर तुरंत डोरे डालने की कोशिश करते हैं और दूसरे कुत्तों से लड़ाई करते हैं. अब जब कुत्ता पाला है तो यह तो होगा ही, इसमें लड़ने की क्या बात है? यह तो कुत्तों की प्रकृति है. अगर कुत्तों का आपस में लड़ना पसंद नहीं है तो या तो उनका आपरेशन करके उनके अन्डकोष निकलवा दो, इससे टेस्टोस्टिरोन बनना बन्द हो जायेगा, और वे शाँत हो जायेंगे. कुत्ते का आपरेशन  नहीं कराना तो कुत्ता पालो ही नहीं, कुत्तिया रखो."

मैं उनकी बात पर देर तक सोचता रहा. टेस्टोस्टिरोन हारमोन सभी स्तनधारी जीवों में, विषेशकर हर जीव जाति के नरों में होता है. यह हारमोन माँसपेशियों का विकास करता है, शरीर में बाल उगाता है, आवाज़ को भारी करता है. सम्भोग की इच्छा और सम्भोग क्रिया में नर भाग निभाने की क्षमता भी इसी हारमोन से जुड़ी हैं.

यही सोच कर मन में यह बात आयी कि हमारे समाजों में जब किसी युवती को पुरुष मारता है, या उससे ब्लात्कार करता है तो अक्सर लोग कहते हैं कि यह इसलिए हुआ क्यों कि उस लड़की ने उस पुरुष को कुछ ऐसा किया जिससे वह अपने पर काबू नहीं कर पाया. इसके लिए वे दोष देते हैं लड़की को, कि लड़की रात को अकेली बाहर गयी, या उसने पश्चिमी वस्त्र पहने थे या छोटे वस्त्र पहने या वह ज़ोर से हँस रही थी.  यानि उनका सोचना है कि चूँकि नर में टेस्टोस्टिरोन है इसलिए यह उसकी प्रकृति है कि जब मादा उसे आकर्षित करेगी तो वह अपने आप पर काबू नहीं कर पायेगा और उस पर हमला करेगा. इसलिए हमारे समाज लड़कियों को अपने शरीरों को चूनर, घूँघट या बुर्के में ढकने की सलाह देते हैं, कहते है कि बिना पुरुष के अकेली बाहर न जाओ, आदि.

Graphic - man attacking woman


शायद इसी बात को सोच कर बहुत से देशों में युवा लड़कियों के यौन अंगो को काट कर सिल दिया जाता है, या उन्हें शरीर ढकने, घर से बाहर न जाने की सलाह दी जाती है, ताकि उनके मन में यौन भावनाएँ न उभरें. शायद इसी वजह से हमारे समाजों ने रीति रिवाज़ बनाये जैसे कि विधवा युवती का सर मूँड दो, उसे सफ़ेद वस्त्र पहनाओ, उसे खाने में तीखे स्वाद वाली कोई चीज़ न दो, जिससे उसे न लगे कि वह जीवित है और उसकी भी कोई शारीरिक इच्छा हो सकती है. इस सब से युवती का आकर्षण कम होगा और अपने पर काबू न रख पाने वाले पुरुष उस पर हमला नहीं करेंगे.

यानि हमारे समाजों ने पुरुषों को पशु समान माना और यह माना कि उनमें किसी युवती को देख कर अपने आप को रोक पाने की क्षमता नहीं हो सकती. इस तरह से हमारे समाजों ने एक ओर "पुरुष अपनी प्रकृति पर काबू नहीं कर सकते" वाले नियम बनाये, जिससे स्वीकारा जाता है कि पुरुष शादी से पहले या विवाह के बाहर भी शारीरिक सम्बन्ध बना सकता है या कई औरतों से विवाह कर सकता है. दूसरी ओर नियम बनाये कि "नारी का अपनी प्रकृति को काबू में रखना ही नारी धर्म है", जिससे निष्कर्ष निकलता है कि अगर पुरुष कुछ भी करता है तो इसमें गलती हमेशा नारी की ही मानी जायेगी.

यानि यह समाज पुरुष को अन्य पशुओं की तरह देखता है, यह नहीं मानता कि परिवार की शिक्षा, समाज की सभ्यता और अपने दिमाग से पुरुष अपना व्यवहार स्वयं तय करता है.

पर इस तरह की सोच हमारे ही समाजों में क्यों बनी हुई है? जैसे यूरोप, अमरीका, ब्राज़ील आदि में समय के साथ बदल गयी है, वैसे हमारे समाजों में क्यों नहीं बदली? यूरोप, ब्राज़ील में आप समुद्र तट पर जाईये आप छोटी बिकिनी पहने या खुले वक्ष वाली युवतियाँ देख सकते हैं, उन पर वहाँ के पुरुष हमला क्यों नहीं करते? शायद यहाँ के पुरुषों में टेस्टोस्टिरोन की कमी है? लेकिन इन देशों में भारत, पाकिस्तान, अरब देशों आदि से आने वाले प्रवासी पुरुष क्यों नहीं इन युवतियों पर हमले करते, क्या यहाँ के कानून से डरते हैं या शायद यहाँ आने से उनके टेस्टोस्टिरोन भी कम हो जाते हैं?

आप ही बताईये क्या हम पुरुष पशु समान होते हैं क्योंकि हमे अपने पर काबू करना नहीं आता? मेरे विचार में यह सब बकवास है.

कुछ पुरुष मानसिक रोगी हो सकते हैं जिन्हें सही गलत का अंतर न मालूम हो. पर यह सोचना कि सभी पुरुष पशु होते हैं, उन्हें अपने शरीरों पर, अपने कर्मों पर काबू नहीं, यह मैं नहीं मानता. पुरुष किसी भी युवती पर हमला कर सकते हैं, इसलिए युवतियों को शरीर ढकना चाहिये, घर से अकेले नहीं निकलना चाहियें, शर्मा कर, छिप कर रहना चाहिये, मेरे विचार में यह सब गलत है.

जो लोग इसे स्वीकारते हैं, वह मानव सभ्यता को नकारते हैं, इस बात को नकारते हैं कि भगवान ने हमें दिमाग भी दिया है, केवल हारमोन नहीं दिये. मुझे लगता है कि इस तरह की सोच पुरुषों को बचपन से ही यह सिखाती है कि जो मन में आये कर लो, हमें औरतों को दबा कर रखना है. इसके लिए हमारे समाज धर्म, संस्कृति और परम्पराओं का सहारा लेते हैं इस तरह की सोच को ठीक बताने के लिए.

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शनिवार, जनवरी 19, 2013

दो बहने़ - जापानी गेइशा और भारतीय मुजरेवाली

जापानी कला प्रदर्शनी लगी थी, जिसका विषय था "उक्कियो ए" (Ukiyo e), यानि "तैरता शहर". सत्रहवीं शताब्दी के जापान में कला दिखाने वाले लोगों को नैतिक दृष्टि से हीन माना जाता था इसलिए उन्हें शहर के बाहर नदी पर रहने को विवश किया जाता था. नावों पर रहने वाले इन लोगों को "तैरता शहर" कहते थे. तैरते शहरों में रहने वाले लोगों में गेइशा (Geisha), चित्रकार, नाटक के अभिनेता, कवि, लेखक, वैश्याएँ, आदि लोग होते थे.

अक्सर समाज ऐसा करते हैं कि जिन व्यक्तियों को नैतिक दृष्टि से हीन या अवँछनीय मानते हैं उन्हें समाज से बाहर निकालने का नाटक करते हैं. पर समाज में जिन ज़रूरतों को पूरा करने के लिए वह काम होते हैं, उनको नहीं रोक पाते और समाज के हाशिये पर सब कुछ वैसे ही चलता रहता है. हाँ उसमें कानून के रखवालों का भ्रष्टाचार और दमन भी जुड़ जाते हैं.

कुछ ऐसा ही "उक्कियो ए" के समाज के साथ भी हुआ. उनको जापानी भद्र समाज ने बाहर तो किया पर उससे नाता नहीं तोड़ा. शाम होते ही, अँधेरे में "उक्कियो ए" में रोशनियाँ जल जातीं और शहर के जाने माने लोग मनोरँजन के लिए वहाँ पहुँच जाते. "उक्कियो ए" की कला प्रदर्शनी इसी जगत का चित्रण करती थी.

आज उकियो ए की कला की बहुत माँग है और पुराने प्रिंट बहुत मँहगे मिलते हें जिनके संग्रह करने वाले सारी दुनिया में फ़ैले हैं.

इसी उकियो ए कला परम्परा के दो नमूने प्रस्तुत हैं.

Geisha and Mujre wali and Indian cinema


Geisha and Mujre wali and Indian cinema

जापानी पाराम्परिक नाटक जैसे कि काबूकि (Kabuki) जापान के बाहर उतने प्रसिद्ध नहीं हुए लेकिन गेइशाओं के बारे में सारी दुनिया के लोग जानते हैं. अक्सर गेइशाओं को "शरीर बेचने वाली स्त्रियाँ" यानि वैश्या समझा जाता है. यह सही नहीं है, आधुनिक गेइशाएँ कलाकार होती है - चाय बनाना, बातें करना, मनोरंजन करना जैसे काम करती हैं जिन्हें एस्कोर्ट (escort) या साथी कह सकते हैं. जापान में अक्सर लोग उन्हें जापानी पाराम्परिक सभ्यता को सहजने वालों की तरह देखता है.

लेकिन मेरे विचार में पुराने समय की जापानी गेइशाओं तथा भारतीय मुजरेवाली या तवायफ़ परम्पराओं में कुछ समानताएँ थीं.

"गेइशा" शब्द दो "कन्जी" (जापानी भाषा के शब्द या इडियोग्राम) से बना है - "गेइ" यानि "कला" और "शा" यानि "व्यक्ति". इस तरह से "गेइशा" का अर्थ हुआ "कलाकार". उनके बारे में बात करते हुए कभी कभी "गेइको" यानि कला+नवयुवती या "मैइको" यानि नाचती+नवयुवती जैसे शब्दों का प्रयोग भी होता है, विषेशकर जब यह स्त्रियाँ जनसमूह के सामने नाचने और गाने की कला का प्रदर्शन करती हैं. गेइको या मेईको जैसे शब्दों को जापानी भाषा में वैसा ही अर्थ दिया जाता था जैसे कि हिन्दी में मुजरे वाली या नौटंकी वाली को दिया जाता था और अक्सर इन स्त्रियों को वैश्या समान ही समझा जाता था.

आज कानूनी दृष्टि से जापान में पैसे के बदले में सेक्स को गैरकानूनी माना जाता है लेकिन अन्य देशों की तरह, वहाँ के हर शहर में वैश्याएँ मिल सकती हैं. जापान जाने वाले बहुत से विदेशी आज भी सोचते हें कि गेइशा का अर्थ वैश्या है, लेकिन आज यह सच नहीं.

भारत में मुजरे वाली या तवायफ़ो का क्या इतिहास है यह मुझे नहीं मालूम, इस बारे में मेरी सारी जानकारी उपन्यासों या फ़िल्मों से ही बनी है.

प्राचीन भारत में "नगरवधू" परम्परा थी. इस विषय पर भगवती चरण वर्मा का उपन्यास "चित्रलेखा" और आचार्य चतुर सेन का उपन्यास "वैशाली की नगरवधु" उल्लेखनीय हैं जिन पर "चित्रलेखा" और "आम्रपाली" जैसी फ़िल्में बनी थीं.

कालिदास के नाटक मृच्छकटिक में वसंतसेना की कथा थी जिस पर "उत्सव" फ़िल्म बनी थी. इस तरह से देखें तो प्राचीन समय से ही भारत में भी शरीर बेचने को नत्य, संगीत जैसी कलाओं में माहिरता के साथ जोड़ा गया था.

कलाकार होने को क्यों हीन माना गया? क्यों लोगों के समक्ष कला प्रदर्शन करने को भारतीय और जापानी समाजों ने नीचा माना? शायद इसलिए कि इस तरह की कलाएँ केवल पैसे वाले राजा महराज या अमीर लोगों के संरक्षण में पनपती थीं और यह लोग उस सरक्षण के बदले में कलाकारों से उनके शरीरों की कीमत माँगते थे? गुलज़ार की फ़िल्म "लेकिन" में कुछ यही बात थी, जिसमें उसकी नायिका लच्छी (डिम्पल कपाड़िया) जो राज दरबार में नृत्य दिखाने आयी थी, राजा को अपना शरीर न देने के लिए आत्महत्या का रास्ता चुनती है.

समय के साथ नगरवधु परम्परा बदली. सत्तारहवीं अठाहरवीं शताब्दी में यही परम्परा मुजरे वाली या तवायफ़ में बदली जैसा कि "पाकीजा" और "उमराव जान" जैसी फ़िल्मों में दिखाया गया था.

नृत्य या गायन के कलाकारों के प्रति यही दृष्टिकोण बीसवीं शताब्दी तक चला. अभी कुछ दशक पहले तक फ़िल्मों में काम करने को भी हीनता की दृष्टि से ही देखा जाता था, और हिन्दी फ़िल्म जगत की प्रारम्भ की फिल्मों में पुरुषों ने ही नारी भाग निभाये, या विदेशों से नायिकाओं को बुलाया गया या गाने बजाने वाले परिवारों की औरतों ने यह काम लिया. जैसे कि प्रसिद्ध अभिनेत्री नरगिस की माँ सुश्री जद्दनवाई इलाहाबाद की गानेवाली थीं.

हीनता की दृष्टि से केवल औरतें ही नहीं पुरुष कलाकार भी देखे जाते थे. हृषीकेश मुखर्जी की फ़िल्म "आलाप" में भी वकील पिता का बेटे (अमिताभ बच्चन) के संगीत सीखने और गुलजार की फ़िल्म "परिचय" में अमीर पिता के बेटे (संजीव कुमार) के संगीत के सीखने के प्रति गुस्सा होना और घर से निकाल देना में कला और बाज़ार को जोड़ कर देखने का दृष्टिकोण था. राजकपूर की "राम तेरी गँगा मैली" में नायिका गँगा के मैले होने को नाचने गाने वाली और अमीर व्यक्ति की रखेल बनने को मजबूर युवती के माध्यम से दिखाया गया था.

भारतीय शास्त्रीय संगीत भी इसी वातावरण में पनपा. नमिता देवीदयाल की पुस्तक "द म्यूज़िक रूम" में इसका सुन्दर वर्णन है.

दस पंद्रह साल पहले तक मुज़रेवाली या तवायफ़ें या नौटँकी वाली, हिन्दी फ़िल्मों का अभिन्न हिस्सा थीं. आजकल की फ़िल्मों में मुझे लगता है कि इस तरह के पात्र कुछ कम हो गयें हैं, हालाँकि "बोल बच्चन" जैसी फ़िल्मों में कभी कभी दिख जाते हैं.

Geisha and Mujre wali and Indian cinema

आज जो औरतें वैश्या बनायी जाती हैं, क्या उन्हें नृत्य संगीत सीखना पड़ता है, मुज़रा करना पड़ता है? अगर "चमेली", "वास्तव", "मौसम" जैसी फ़िल्मों के बारे में सोचे तो शायद नहीं.  दूसरी ओर आज कलाकारों के पास जीवन यापन के लिए नये माध्यम बने हैं, अच्छी गायिका या नृत्याँगना या अभिनेत्री होना प्रतिष्ठा से देखा जाता है, इसलिए आधुनिक जगत को तवायफ़खानों और मुजराघरों की आवश्यकता नहीं. हाँ पुरुषों को वैश्याओं की आवश्यकता अब भी है, इसलिए शरीर का व्यापार नहीं बँद हुआ.

पर शायद नौटँकी में काम करने वाली औरतों को, जिन्हें फणीश्वरनाथ रेणू की कहानी "मारे गये गुलफ़ाम" पर बनी फ़िल्म "तीसरी कसम" में बखूबी दिखलाया गया था, उन्हें शायद आज भी हीन दृष्टि से देखा जाता है? गायकी, नृत्य या अभिनय जैसे क्षेत्रों में प्रतिष्ठा, पैसे और बदलते समाज के बदलते माप दँडों से जुड़ी है. नौटँकी देखने वाले समाज में अभी वह बदलाव आया है या नहीं यह तो वही बता सकता है जो आज के ग्रामीण जगत को जानता है. या शायद टीवी और फ़िल्मों के सामने, नौटँकी की दुनिया भी मुजरेवाली और उकियो ए की दुनियाओं जैसे गुम हो चुकी है?

अगर आप उकियो ए के बारे में अधिक जानना चाहते हैं तो अमरीकी संसद के पुस्तकालय के वेबपृष्ठ पर इसकी ओनलाइन प्रदर्शनी अवश्य देखिये, बहुत सुन्दर है.

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रविवार, अक्तूबर 07, 2012

शरीर की प्यास


रानी मुखर्जी की नयी फ़िल्म "अईय्या" का एक गाना देखा तो एक पुरानी बात याद आ गयी.

करीब 35 वर्ष पहले की बात है, मेरे क्लिनिक में एक महिला आयीं. पचास या बावन की उम्र थी उनकी. उनकी समस्या थी कि उनके पति में आध्यात्म योग का वैराग्य जागा था. वह अपने शरीर पर और इच्छाओं पर संयम रखना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने अपनी पत्नि से शारीरिक सम्बन्ध न रखने का फैसला किया था. उन महिला का कहना था कि वह इस बात से बहुत दुखी थीं और पति का समीप न होना उन्हें बहुत कष्ट देता था. वह बोली, "मेरे शरीर की भी तो प्यास है, मुझे अपने पति से सम्बन्ध चाहिये, उनका सामिप्य चाहिये, मैं क्या करूँ?"

उन महिला के पति मुझे बहुत मानते थे इसलिए वह चाहती थीं कि मैं उनके पति से कहूँ कि वह इस तरह से पत्नी से सब सम्बन्ध न तोड़ें. मैंने उस समय तो उनसे कहा कि हाँ मैं आप के पति से इस विषय में बात करूँगा. लेकिन मन ही मन में कुछ हड़बड़ा गया था.

रात को मैंने अपनी पत्नि से इसके बारे में सलाह माँगी. मेरी पत्नि का कहना था कि नारी जब पति का सामिप्य चाहती है तो बात केवल शारीरिक सम्बन्धों की नहीं है, बल्कि नारी के लिए वह तो इसका केवल एक हिस्सा है. नारी के सामिप्य की चाह में एक अन्य भाग होता है मानसिक सामिप्य का, एक दूसरे को छूने का, यह जताने का और कहने का कि तुम मेरे लिए प्रिय हो. इसलिए मेरी पत्नी के अनुसार मुझे उन महाशय से कहना चाहिये था कि अगर वे अपने आध्यात्मिक व्रत के कारण अपनी पत्नि से शारीरिक सम्बन्ध न भी रखना चाहें, तो कम से कम मानसिक रूप से उन्हें अपनी पत्नि के करीब होना चाहिये. मेरी पत्नी ने यह भी कहा कि पति पत्नि के रिश्ते के बारे में इस तरह का एकतरफ़ा निर्णय लेना ठीक नहीं, जो भी बात हो दोनो को मिल कर निर्धारित करनी चाहिये, नहीं तो पत्नि विवाह के बाहर भी उस कमी को भर सकती है.

अगर हमारे समाज में सेक्स और आँतरिकता के बारे में बात करना बहुत कठिन है तो यह बात हमारे मेडिकल कालिजों पर भी उतनी ही लागू होती है. जब मेरे मेडिकल कालिज में एनाटमी यानि शरीर विज्ञान की पढ़ायी के दौरान नर और नारी गुप्त अँगों की बारी आयी तो हमारे प्रोफेसर साहब ने मुस्करा कर टाल दिया. कक्षा में बोले कि यह हिस्सा अपने आप पढ़ लेना. न ही फिज़ीयोलोजी में सामान्य सेक्स सम्बन्ध क्या होते हैं के बारे में कुछ पढ़ाया या बताया गया. जब कुछ सालों के बाद बीमारियों के बारे में पढ़ाया गया तो गोनोरिया या सिफलिस जैसे गुप्त अंगो के रोगों का इलाज किन दवाओं से किया जाना चाहिये, यह तो पढ़ाया गया लेकिन नर नारी के बीच सेक्स सम्बन्ध में क्या कठिनाईयाँ हो सकती हैं और उनका इलाज कैसे किया जाये, इसकी कभी कोई बात नहीं हुई. फैमिली प्लेनिँग यानि परिवार नियोजन क्या होता है यह अवश्य कुछ पढ़ाया गया लेकिन हस्त मैथुन के क्या प्रभाव होते हैं, या कण्डोम का सही प्रयोग कैसे करना चाहिये जैसी बातों के बारे में कुछ नहीं बताया गया था.

कहने का अर्थ यह है कि मेडिकल कालेज से मेरी तरह के निकले आम डाक्टरों को यह सब कुछ पता नहीं होता कि सेक्स क्या होता है और पति पत्नि की सेक्स इच्छाओं में क्या भेद होते हैं, उन्हें किस तरह की सलाह देनी चाहिये! बस उतना ही मालूम होता है, जो अन्य लोगों को होता हैं, या जितना किसी किताब या पत्रिका में लिखा मिल जाये, वह भी तब जब वह इस विषय पर स्वयं कुछ खोज करें. यह तो आज को नवयुवक डाक्टर ही बता सकते हैं कि क्या इस विषय में आज के हमारे मेडिकल कालेज बदले हैं या नहीं? आज सेक्स के बारे में इंटरनेट पर इतना कुछ भरा है कि सारा जीवन देखते पढ़ते रह सकते हैं, लेकिन यह सब सेक्स को खरीदने बेचने के कारोबार जैसा है, इससे लोगों को सेक्स के बारे में क्या सही सलाह दी जाये, यह समझना उतना आसान नहीं.

हमारे समाज में आम सोच भी है कि लड़कों और पुरुषों को सेक्स की भूख होती है, जबकि लड़कियाँ और नारियाँ इसे केवल सहती हैं. यानि इस सोच में नारी की यौनिकता को नकार दिया जाता है या पुरुष यौनिकता से कमज़ोर माना जाता है. यह सोच भी है कि विवाह के बाहर सेक्स से लड़की की इज़्ज़त लुट जाती है या, कोमार्य उनका सर्वोच्च धन है जिसे उन्हें सम्भाल के रखना चाहिये. पुरुषों को इस तरह की सलाह नहीं दी जाती, बल्कि उनके लिए सलाह होती हैं कि अगर किसी से सम्बन्ध करने हैं तो कण्डोम का प्रयोग करो जिससे अनचाहे बच्चे या गुप्त रोग न हों.

इसी तरह के विचारों की बुनियाद पर ही भारत, पाकिस्तान, बँगलादेश जैसे देशों के पाराम्परिक समाज में लोग, "नारी को अकेले घर से बाहर नहीं निकलना चाहिये", "लज्जा करनी चाहिये", "घूँघट करना चाहिये", "बुर्का पहनना चाहिये", जैसी बातें करते है. इन्हीं विचारों की बुनियाद पर ही मध्य पूर्व तथा अफ्रीका के कुछ देशों में बच्चियों तथा नवयुवतियों के गुप्त अँगों को बचपन में काटा जाता है और कभी कभी सिला भी जाता है, ताकि उनकी यौनिकता को मुक्त पनपने का मौका न मिले. इसी तरह की कुछ बात कैथोलिक धर्म में होती है जब सेक्स को केवल प्रजनन का माध्यम माना जाता है और केवल प्रेम के लिए या वैवाहिक आनन्द के लिए सेक्स को, और परिवार नियोजन के उपायों के प्रयोग को, जीवन के विरुद्ध मान कर अस्वीकार किया जाता है.

लेकिन आर्थिक विकास के साथ पिछले दशकों में एक अन्य बदलाव आया है. आधुनिक लड़कियाँ और युवतियाँ जानती हैं कि कैसे परिवार नियोजन के उपायों के सहारे गर्भ को रोका जा सकता है और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर युवतियों को समाज की स्वीकृति की उतनी परवाह नहीं. इससे नारी यौनिकता को अभिव्यक्ति का मौका पुरुषों के बराबर मिलता है.

बम्बईया फ़िल्मों में भी स्त्री पुरुष सम्बन्धों को अधिकतर पुरुष की दृष्टि से तरह से दिखाया जाता रहा है जिसमें पुरुष यौन सम्बन्ध चाहता है और "रूप तेरा मस्ताना" गा कर अपनी इच्छा को स्पष्ट कहता है जबकि नारी शरमाती हिचकिचाती है. लेकिन बदलते समाज के साथ नारी यौनिकता को भी मुम्बई फ़िल्मों में कुछ स्वीकृति मिलने लगी है.

मेरे विचार में भारत की आधुनिक अभिनेत्रियों में रानी मुखर्जी ने नारी यौनिकता को सबसे मुखर तरीके से व्यक्त किया है. हाल में ही आयी "द डर्टी पिक्चर" और "इश्किया" फ़िल्मों में विद्या बालन ने भी नारी यौनिकता को मुँहफट तरीके से व्यक्त किया था, लेकिन वह अभिव्यक्ति सामान्य जीवन के बाहर के नारी चरित्रों से जुड़ी थी. प्रियँका चोपड़ा ने भी अपनी फ़िल्म "एतराज़" में नारी यौन प्यास को अभिव्यक्त किया लेकिन उसमें उनका चरित्र पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित था. दूसरी ओर रानी मुखर्जी ने "साथिया", "पहेली", "युवा" एवँ "बँटी और बबली" जैसी फ़िल्मों में भारतीय समाज की सामान्य शहरी और गाँवों की नारियों की यौनिकता के विभिन्न रूपों को सुन्दरता से व्यक्त किया है.

Rani Mukherjee - expressing female sexuality

"अईय्या" के गाने में रानी मुखर्जी का पात्र अपने मनभाये पुरुष के पेट पर उभरे सिक्स पैक पर हलके से उँगली फ़िरा कर जताता है कि उसे अपने प्रेमी का शरीर सेक्सी लगता है.

इसी फ़िल्म का एक अन्य गीत "वाट टू डू" भी नारी पात्र की यौन इच्छा और पुरुष पात्र के हिचकिचाने, घबराने को रोचक तरीके से प्रस्तुत करता है. अक्सर लोग इस तरह के गीत को मज़ाक के रूप में देखते हैं कि सचमुच के जीवन में पुरुष नहीं घबराते हिचकिचाते, बल्कि युवतियाँ हिचकिचाती घबराती हैं. लेकिन मेरे अनुभव में जब कोई स्त्री अपनी यौनिकता को सहजता से स्वीकार कर लेती है और आत्मविश्वास के साथ कहती है कि उसे भी सेक्स और आँतरिकता चाहिये, तो अधिकतर पुरुष घबरा और बौखला जाते हैं, उनका आत्म विश्वास आसानी से चरमरा जाता है.

खुल कर अपने मूल्यों पर अपना जीवन जीने वाली युवती को वही पुरुष स्वीकार कर पाता है जिसमें पूरा आत्मविश्वास हो. जिनमें यह आत्मविश्वास कम हो या न हो, वह पाराम्परिक पति परमेश्वर बने रहना चाहते हैं और पाराम्परिक पत्नी चाहते हैं. उन्हें स्वच्छन्द जीवन जीने वाली युवती में समाज और परिवार का विनाश दिखता है और वह उन युवतियों को चरित्रहीन कहते हैं, उन्हें संस्कृति की याद दिलाते हैं, उन्हें शरीर ढकने, लज्जा करने और शालीनता के सबक देते हैं.

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